माता पिता और बच्चे

प्रत्येक माँ बाप से यदि पूछा जाए कि संसार में आपको सबसे प्रिय कौन है ?तो निस्सन्देह सब का उत्तर होगा कि अपनी संतान ।वे सारा जीवन एकमात्र अपनी ज़िंदगी उनके इर्द -गिर्द सोचते हुए ही बिता देते हैं ,चाहे वे उनके पास हों या दूर हमेशा उन्ही की चिंता में हरपल डूबे रहते हैं ।

परन्तु अनुभवी लोगों के जीवन का अनुभव यही कहता है कि वे बच्चे जो अपने माता पिता की आज्ञा -सलाह को सुनते और मानते भी हैं वे ख़ुशहाल रहते हैं ,क्योंकि वे अपने सिर पर बड़ों का आशीर्वाद मान कर चलते हैं ।बड़ों के आशीर्वाद से बढ़ कर इस दुनिया में कुछ भी नहीं ।जो बच्चे ह्रदय से अपने माता पिता को सम्मान देते हैं ,ईश्वर उनकी मनोकामनाएँ भी शीघ्र पूरी कर देता है ।और वे निरंतर अपनी सफलताओं को पाते जाते हैं क्योंकि परमात्मा ने बच्चों को संसार में उतारने के लिए  एक निश्चित माता -पिता को माध्यम बनाया है वे अपने आप नहीं आए हैं।

परन्तु आधुनिक काल में पीढ़ी का अन्तर है अपने समय में यदि हम सोचें तो हमारे माता पिता जो कह देते थे हम केवल उसे सुनते ही नहीं अपितु उस पर अमल भी करते थे ।पर आजकल तो उन बच्चों के पास में समय ही नहीं है ,इलेक्ट्रॉनिक की इतनी चीज़ें हैं कि उनका दिमाग़ उनमें ही व्यस्त रहता है डूबा -घिरा रहता है कि माता -पिता की बात किस समय सुनें ?चाहे कुछ भी हो जाए दुनिया में सबसे अधिक प्यार संतान को माता-पिता ही करते हैं ,और वे कभी उनका बुरा करने की तो छोड़िए उनका बुरा सोच भी नहीं सकते ।सो हमारा मशविरा तो होगा कि उनकी बात ज़रूर सुननी चाहिए जो तुमसे इतना प्यार करते हैं ।

यदि आज के बच्चे अपने माता पिता की बात सुनना चालू कर दें तो उनका जो आधुनिक युग की देन है तनाव वह सारा ख़त्म हो जाएगा ,अंदर से ही स्ट्रेस ख़त्म हो जाएगा । उनकी इस न सुनने की आदत से ही एक नकारात्मक सोच उनके दिमाग़ में भर जाती है ,अगर सकारात्मक सोच रख कर सुनें ,सोचें ,आशीर्वाद लें जिसमें कि असीम शक्ति है तो ख़ुशहाल जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

आज के माता पिता के मन में बहुत सी बातें उभर कर आती हैं,उनको घुटन भी होती है पर फिर यही सोच उभरती है कि शायद जब बच्चे  स्वयं माता पिता बनेंगे तभी वे उस दर्द को समझ पाएँगे जो एक माता पिता अपनी संतान के लिए महसूस करते हैं ।शायद उस समय उनका दर्द सुनने के लिए वे माता पिता नहीं होंगे ।

अंत में ख़ैर, यह तो संसार है ऐसे ही चलता है । बच्चे स्वयं को सर्वेसर्वा मान कर चलते हैं ।अधिक नहीं , स्वयं को कर्त्ता मानना और यह सोचना कि माता पिता ने किया ही क्या है ?इसी को उलटा सोच लें कि कर्त्ता माता पिता हैं हम तो बस उनके दिशा-निर्देश से काम चला रहें हैं उनका तनाव ग़ायब हो जाएगा ।उदाहरण के लिए जैसे फ़ैक्टरी में लगी आग की तपिश जितनी मालिक तक पहुँचती है उतनी श्रमिक तक नहीं बस यही थोड़ी सी सोच बदलनी होगी फिर आनंद ही आनंद है ।

।।इति ।।

मोह

जीवन में शांति ,सुकून और ठहराव चाहिए तो इस मोह को भूलना -छोड़ना होगा ,इसके रहते तुम्हारी इंद्रियाँ सबल नहीं बन सकती ।यह अनुभूति नहीं अकाट्य तथ्य है,मोह किसी के भी प्रति हो सकता है अर्थात् सजीव या निर्जीव वस्तु के प्रति ।अन्ततःयह धीरे -धीरे तुम्हारी इंद्रियों को भीतर ही भीतर चूसता रहता है और तुम जीते हुए भी पल पल मर रहे होते हो ।

यदि देखा जाए तो मोह या आसक्ति प्रत्येक व्यक्ति में भिन्न -भिन्न हो सकती है यथा माँ अपने बारे में सोचे तो बच्चों का मोह उसके मस्तिष्क और हृदय पर पूरी तरह हावी होता है और वही एक फाँस उसे अंदर ही अंदर चुभती है लाख निकालने का प्रयास करने पर भी उसके लिए निर्मोही हो पाना संभव नहीं होता ।

यह एक माँ के लिए ही नहीं अपितु प्रत्येक मोहग्रस्त व्यक्ति के  लिए यह अनुभूति गहरी होती है ।और सब न चाहते हुए भी इस मोह के मायाजाल में फँसे रहते हैं क्योंकि मुद्दा भावनाओं से जुड़ा है ।यदि दिमाग़ से सोचा जाए तो तुम्हें समझ आएगा ,पर वह क्षणिक बुद्धि के करतब के अतिरिक्त कुछ भी नहीं होगा ।अगर संसार में चैन -सुख-शांति चाहिए तो स्वयं अपने आप को मज़बूत बनाओ और इस मोह के मायाजाल को उतार फेंको ।गीता अध्याय पढ़ो किस प्रकार से कृष्ण ने अर्जुन का मोह भंग किया और उसे युद्ध करने के लिए तैयार कर दिया ।यह जगत-संग्राम संसार का युद्ध यदि जीतना है तो इस मोह को दूर कर निर्लिप्त-निरासक्त हो कर इस रण क्षेत्र में उतरना होगा अन्यथा यूँ ही हिचकोले खाते पल-पल गुज़रते काल को समाप्त होते देखना होगा ।अतः संभल कर अपनी इंद्रियों को संयमित कर उन्हें जीत कर वास्तविकता के अर्थ पटल को समझ कर प्रकाशमयी भूमिका में उतरना होगा ,वरना यह जीवन जीवन न हो कर कुछ और ही बन जाएगा ।

आओ प्रयास करें अभी से इस मोह से किस तरह से मुक्ति पा कर स्वतंत्र निर्भय जीवन जिया जाए ।यह हमारे मोह बन्धन का जाल है इसके लिए स्वयं को साहसी बना अपने मज़बूत मन के शस्त्रों से इन बंधनों को काट फेंकना होगा और स्वयं को स्वतंत्र करना होगा ।

।।इति ।।

 

धोखा

‘जो न दे दग़ा ,वो ही है सगा ”

इस संसार में ज़िंदगी का सफ़र तय करते हुए बहुत से दृश्य आते हैं। कुछ सुहाने ,लुभावने और कुछ ऐसे भी नज़ारों से दो चार होना पड़ता है ,जिनकी पुनरावृति हम कतई नहीं चाहते ।

इस सफ़र में हमें बहुत से यात्री मिलते हैं कुछ रिश्तों के सम्बंधी होते हैं और कुछ ऐसे बिना किसी रिश्ते के होते हैं परंतु जो रिश्तों से भी बढ़कर कुछ बन जाते हैं ।कई  बार ऐसी कड़वी घूँट को भी पीना पड़ता है जिसके बारे में हमने कभी सोचा नहीं होता है ।चलते -चलते हम किसी के प्रति अगाध विश्वास करने लगते हैं परंतु हमें कई बार उसी से धोखा मिलता है ।ऐसा हम समझते हैं ,पर नहीं यह धोखा वह इंसान हमें नहीं देता क्योंकि कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे को धोखा नहीं दे सकता ,कहने का अभिप्राय यह है कि अपने से स्वयं से बढ़कर कोई किसी को धोखा नहीं दे सकता हम जब भी किसी को धोखा देने की सोचें तो समझ जाना चाहिए कि हम स्वयं को ही धोखा दे रहे हैं ।स्पष्टता के लिए इस प्रकार समझ सकते हैं ,जैसे हम किसी को कोई बात बता रहे हैं सामने वाला व्यक्ति तो उसे ही अक्षरश : सत्य समझता है ,क्योंकि उसे इस बात का इल्म भी नहीं है कि इस में कुछ झूठ मिलाया गया है परन्तु उस झूठ को बताने वाला जानता है कि इसमें कितना सच और कितना झूठ है ?अतः तो कौन किसको धोखा दे रहा है ,जो कि देर सवेर कभी न कभी उस के सामने आएगा उस समय उसे बर्दाश्त करना बहुत कठिन हो जाएगा ।

सारांश रूप में यही समझना चाहिए कि स्वयं को धोखा न दें क्योंकि हम किसी को धोखा नहीं दे सकते अतः स्वयं को धोखा देने से बचें ।सगा कोई और नहीं हम ही अपने सगे हैं ।

कहा गया है मन -वचन -कर्म से एक होता है सज्जन ,और मन-वचन-कर्म से भिन्न होता है दुर्जंन ।अतः स्वयं का हित चाहने वाले धोखे का दामन छोड़ ईमानदारी का मार्ग थामें इसी में कल्याण होगा ।

।।इति ।।

युवा एवं प्राथमिकता

ज़िंदगी समस्याओं का जंजाल है और मनुष्य उस जाल में से निकलने के लिए छटपटाता हुआ जीव है ,जो प्रतिपल उस में से निकलने के लिए सही मार्ग को चुनने की जद्दोजहद में लगा  रहता है । जीवन में बहुत से कार्य होते हैं परन्तु उनमें से क्रमानुसार  प्राथमिकता के आधार पर चुनना- चयन करना भी हमारा ही कार्य होता है कि कौन सा कार्य क्रमानुसार करने में पहले होना चाहिए और कौन सा बाद में ?

 

एक युवा के लिए सर्वप्रथम उसकी नौकरी-आजीविका -जॉब भी हो सकती है ,तथा इसके साथ जुड़ी और भी बातें होती हैं या हो सकती हैं जैसे अभी कहा नौकरी -यह तो ड्यूटी है करनी ही करनी है परन्तु इसके अतिरिक्त और भी ड्यूटीज़  होती हैं ज़िम्मेदारियाँ होती हैं जो इसके साथ ले कर चलनी होती हैं । वे भी अनिवार्य हैं जो करनी पड़ती हैं चाहो या ना चाहो । जब शादी होती है उसके बाद समझ में आता है कि उन सब कार्यों में  क्रम से तालमेल बिठाना पड़ता है । और अगर समझना चाहो तो मेरी नज़र में जैसे सप्ताह में सात वार होते हैं और ऐसे ही मानो आठवाँ वार  होता है परिवार ,यह मैंने कहीं पढ़ा है । इसे कभी मत भूलो ——FAMILY 

F—-Father

A—-And

M—-Mother

I—-I

L—-Love

Y—-You

यदि सोचें तो यह फ़ैमिली भी हमारी ज़िम्मेदारी के क्रम में शामिल है , हम इसको नज़रंदाज नहीं कर सकते । प्रत्येक युवा का यह फ़र्ज़ है कि वह अपनी अन्तरात्मा में झाँक कर टटोल कर देखे या उसे देखना चाहिए कि मैं अपनी फ़ैमिली को धोखा तो नहीं दे रहा  उसके प्रति भी ईमानदार हूँ , फ़ोकस्ट हूँ , या मैं कहीं अपने स्वार्थ में उन्हें चीट कर रहा हूँ । यदि ऐसा हो तो संभल जाना चाहिए क्योंकि जब जागो तभी सवेरा । वैसे भी “मन में अपराध बोध लेकर जीना ज़िंदगी को बोझिल बनाना है ।”

ग़लती हरेक से होती है ,महान वह है जो समय रहते अपनी ग़लती को सुधार ले । और सही राह पर चल कर अपने जीवन को सफल बनाए ,क्योंकि हमेशा सही राह पर चल कर ही इंसान लक्ष्य तक पहुँच पाता है । आज तक इतिहास में सफल हुए व्यक्ति सही राह ,सही आदत और सही आचरण से ही महान बनें हैं । प्रत्येक युवा का यह कर्तव्य है कि सजग रह कर , विचारपूर्वक अपने लिए सही राह का चुनाव करे । परन्तु कई बार सतर्क रहते हुए भी ग़लत राह पर चल पड़ते हैं ,ऐसे में घबराने की ज़रूरत नहीं है अपितु समझदारी से काम लेना चाहिए ।

अगर कभी राह में भटक जाओ या राह दिखायी न दे तो अपने से बड़ों की राय ली जानी चाहिए । माँ- बाप को भी वृद्धावस्था में सहारे की ज़रूरत होती है ,उनका सहारा बन कर पुण्य कमायें और अपना जीवन सफल बनाएँ ।और पूर्ण श्रद्धा से  उनकी सहायता  करते हुए ही सही राह पर चल कर लक्ष्य तक पहुँचना चाहिए अन्यथा ग़लत रास्ता एक भटकाव है जिसमें मंज़िल नहीं मिलती , पछतावा मिलता है हाथ कुछ नहीं आता ।समय रहते संभलने में ही भलाई है वरना फिर अन्त में सोचोगे ——

“अब पछताए क्या होत ,जब चिड़िया चुग गयी खेत ।”।।इति ।।

 

जीवन -मृत्यु

प्राचीन काल से लेकर आज तक मनुष्य इसी प्रश्न की तलाश में है कि जीवन क्या है ? और मृत्यु क्या है ? ऋषि मुनि अपनी -अपनी समझ और विचारधारा के अनुसार , अनुभव के आधार पर विभिन्न मत रखते हुए इस संसार को छोड़ कर चले गये ।

सृष्टि के नियम में ये दोनों बातें जीवन और मृत्यु अटल हैं ,इसे कोई भी मिटा नहीं सकता ।गीता में कहा गया है ——-

“जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं  जन्म मृतस्य च ।” क्योंकि इस मान्यता के अनुसार जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है ।

जन्म लेने के साथ ही मानव जीवन की मृत्यु की ओर जाने वाली कड़ी आरम्भ हो जाती है या यूँ कहें कि उलटी गिनती शुरू हो जाती है । संसार में जन्म लिया और मनुष्य की यात्रा प्रारम्भ ,कौन सी यात्रा है ?यह यात्रा ही मृत्यु की ओर जाने की है अर्थात् जब तक मृत्यु नहीं आती तब तक उस यात्रा को पूरा करना है । और प्रश्न है कि इस यात्रा को मंज़िल तक कैसे पहुँचाया जाए ?

सारी जद्दोजहद इसी जीवन को जीने में है कि जीने की कौन सी राह चुनी जाए ? किस पर चल कर सुकून से जीना संभव है ? इसका निर्णय मनुष्य जीवन में आने वाली परिस्थितियों को देख कर परख  कर करता है और अपनीं राह चुनता है ,और उस राह में सुख -दुःख सभी आते हैं उन्हें किस तरह से अपने योग्य -अनुरूप बनाए ताकि जीवन की राह आसान हो सके ,उसके सारे प्रयास इसी सोच पर केंद्रित रहते हैं कि कठिनाईयों को कैसे पार करें । जीवन में आने वाली छोटी-छोटी बड़ी से बड़ी बाधाओं को कैसे पार किया जाए और साथ ही छोटी -छोटी ख़ुशियों में कैसे आनंद मनाया जाए ?इन सब का आधार मानवीय सोच विचार ही है ,इसी चिंता-चिंतन -मनन में ही जीवन बीत जाता है ।

परिणामतः देखें तो सुकून भरी राह यही हो सकती है कि मनुष्य वर्तमान में जिए ,बीते का ग़म न आगे की फ़िक्र यही है ज़िंदगी इसलिए 

“बीति ताहि बिसार दे ,आगे की सुधि ले ”

अतःवर्तमान में जीते हुए अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर रहो ,किसी का भला कर सको तो करते चलो । इति ।

सम्बन्ध

परिवार मानव निर्मित इकाई नहीं है । उसे उस परम पिता परमात्मा ने रचा है ।कौन -कौन उसके सदस्य बनने हैं , उन सबका चुनने या बनाने वाला ईश्वर है । मनुष्य का तो यह कर्तव्य बनता है कि वह उस विधाता की इस देन को  सहेज कर रखे । उसने जो रिश्ता बनाया है और जिस रिश्ते में बांधा है उस रिश्ते का मान रखें । रिश्ते निभाने की चीज़ है , रिश्ते निभाने चाहिए और उनका आधार प्रेम के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है ।

माता पिता और बच्चे यह परिवार का सर्वप्रथम मूल अंश है ,इसको संगठित कर एक मज़बूत रूप देना चाहिए । प्रत्येक सदस्य को सोचना चाहिए कि हमें भगवान ने जोड़ा है अतः हमें जुड़ के ही रहना है  । हमारे सभी कार्य इसी दिशा में होने चाहिए , सदैव ध्यान रखना चाहिए कि मतभेद बेशक हो जाएँ मनभेद न हों । बड़े छोटों को आशीर्वाद – दुआएँ देते रहें और छोटे बड़ों  का सम्मान करें , साथ ही साथ सहनशील बनें । क्योंकि यह मान कर चलें कि यह परिवार ही है ,जिसमें बिना स्वार्थ के प्यार मिलता है । इससे बाहर जो भी रिश्ते हैं सब में स्वार्थ घुला-मिला रहता है । परिवार में चाहे कितनी भी लड़ाईं हो जाए ऊँच-नीच हो जाए परंतु दिलों में प्यार कम होने सम्भावना शून्य रहती है । बच्चे माँ बाप को कई बार कटुता से बोल देते हैं , परन्तु माँ बाप के हृदय में उनके प्रति कभी कड़वाहट नहीं आती । क्योंकि यह प्राकृतिक है कि वे सदैव उन पर अपनी ममता ही लुटाते है । यही उनका स्वभाव है , स्वभाव को बदला नहीं जा सकता देखिये ——-

“बादल समुद्र का खारा पानी लेकर भी वर्षा के रूप में मीठा पानी ही बरसाता है ।”

“साँप मधुर दूध पी कर भी विष उगलता है ”

परिवार के प्रत्येक सदस्य को हमेशा यह सोचना चाहिए कि मैं अन्य सदस्यों के लिए और क्या कर सकता हूँ । परिवार में प्रेम प्यार का होना बहुत ज़रूरी है । जहाँ पर प्रेम होता है वहीं पर लक्ष्मी और ख़ुशियाँ भी स्थायी रूप से रहने लगती हैं । इसके अभाव में घर-घर नहीं रहता है , नित्य क्लेश के कारण सब कुछ समाप्त हो जाता है बरकत नहीं रहती ।सांसारिक  सम्बन्धों का  नियम है  पारस्परिक आदान – प्रदान । कहा जाता है कि जो पाना चाहते हो उसे ही देना आरम्भ कर दो वह स्वतः ही तुम्हारे पास आ जाएगा यथा  प्यार ,पैसा ,वस्त्र,नफ़रत,आनंद ,सुख -दुःख,कुछ भी  जो चाहिए देना शुरू कर  दो ।

निष्कर्ष यही है कि परिवार का आधार प्यार है इसको फैलाने और बनाए रखने के लिए सतत प्रयत्नशील रहें ,सहनशीलता अपनाएँ ,सन्मार्गी बनें और बनाएँ जिससे परिवार में ख़ुशियाँ लहलहायें  ।।इति ।।

पड़ाव

पावन अमृत कलश के जल बिंदु से  स्रष्टा के सृजन का अनमोल मोती सा जीवन पाकर  मानव धन्य हो गया । जीवन  के आरम्भ में शैशव में  क्रमशः लड़खड़ाने के पश्चात्  दो पगों पर स्थिर हो कर खड़ा होना सीखा तो हर्षित हुआ ,पुनः पग भर कर जब चलना सीखा तो स्वयं सा अद्भुत शायद ही कोई और होगा ऐसा समझने लगा ।बस यहीं से उसकी जीवन यात्रा को तय करने की शुरुआत हो जाती है ।और फिर  इस राह पर चलते-चलते बहुत से ऊँचे -नीचे ,ऊबड़ -खाबड़ , संकरे ,पगडंडी भरे , सुहाने , मनोहर , घुटन भरे ,ऊमस भरे ,प्रकाश एवं अंधकार से भरे न जाने कौन-कौन से और भी कई रास्तों को पार करते -करते  फिर  वह ऐसे मोड़ पर पहुँच जाता है , जहाँ के बाद राह में इतनी  विभिन्नताएँ तो नहीं रहतीं  ,परन्तु जीवन के पड़ाव या ठहराव का एक ऐसा मोड़ आता है ,जहाँ पहुँच कर उसे लगने लगता है शायद अब गतिशीलता उतनी नहीं रही ।

यह जीवन में आने वाली वह अवस्था है जिसके बाद और कोई अवस्था अवतरित नहीं  होती । सोच कर देखा जाए तो वृद्धावस्था एक ऐसी ही अवस्था है , और यह जीवन का वह  सुनहरा अध्याय है जिससे पूर्व ऐसा कोई मोड़ या पड़ाव नहीं था ।एक ठहरे हुए बहाव की नदी के समान , जिसमें ऊपर से तो  शांति दृष्टिगोचर होती है परन्तु अंतर्मन की उथल -पुथल की लहरें पहले से कहीं अधिक तीव्र हो जाती हैं ।

यहाँ पहुँच कर अतीत के दृश्यों को पलटता हुआ मनुष्य अपने सम्पूर्ण जीवन का मूल्याँकन कर सकता है । पुनर्विचार करता हुआ कोमल भाव लताओं के  गुंफ़न में बहुत बार ऐसा उलझता है कि उनसे बाहर निकलने का कोई कोर या सिरा उसे नहीं मिल पाता है । परन्तु उसे यही बीता  हुआ कल अपनी सम्पत्ति के समान लगता है और इसी परिधि में चक्कर लगाता  हुआ वह अपना समय व्यतीत करने लगता है । अतीत के झरोखों से छन कर आती स्मृतियाँ उसे कभी प्रसन्न और कभी ग़मगीन कर जाती हैं , फिर भी वह उन्हें ही समेटना और बाँटना चाहता है ।

मनुष्य का पूरा जीवन सदैव किसी आशा के वशीभूत हो भविष्य के लिए कुछ सपने संजोये उनके पूरा होने की बाट जोहता रहता है । फिर अब इस पड़ाव पर पहुँच कर उसे लगता है कि अब सपनें क्या देखने ? क्योंकि अतीत में देखे गए सभी सपनों का पूर्ण विवरण और उनका परिणाम उसके समक्ष खुला पड़ा होता  है । परन्तु फिर भी सपने देखने का मोह ,मृत्यु पर्यन्त छोड़ नहीं पाता या उससे छूट नहीं पाता । ख़ैर 

सारांश रूप में यह समझ लेना चाहिए कि यह एक ऐसा पड़ाव है , जहाँ पर पहुँच कर और आगे कोई अवस्था आने वाली नहीं है । अतः जो भी समय है उसको आनंद और ख़ुशी के पल मान कर  उनका  भरपूर लुत्फ़ उठाना चाहिए ।लेकिन प्रायः देखने में जो सोच ,अक्सर सुनायी देती है कि अब बस न जाने कब उसकी इस दुनिया की यह पुस्तक समाप्त होगी और पुनः नए सिरे से नए जीवन का नया अध्याय आरम्भ होगा और उसे याद आने लगती हैं रहीम जी की कभी पढ़ी हुई ये पंक्तियाँ ———

“माली आवत देखि के,कलियन करे पुकारि ।

फूले-फूले चुनि लिये ,कालि हमारी बारि ।।”

रिश्ते

संसार में मानव -मानव के बीच का सम्बन्ध किसी रिश्ते को जन्म देता है । और रिश्ते भी कई प्रकार के हो सकते हैं । मुख्यतः यदि मानें तो एक रिश्ते वे हैं , जो भगवान द्वारा निर्मित हैं और दूसरे वे जो मनुष्य स्वयं अपने स्नेह और भावना से बनाता है । कई बार बनाए गए रिश्ते प्राकृतिक रिश्तों को भी मात दे देते हैं । पिछले दिनों एक समाचार पत्र में पढ़ा था कि एक व्यक्ति ने अपनी पाँच करोड़ की  सम्पत्ति   अपने नौकर के नाम कर दी । यह ऐसा ही है जो रिश्ता पूर्व निर्मित न हो कर रहते -रहते पनपा और इतना अधिक प्रगाढ़ हो गया ।

रिश्तों को निभाना भी एक कला है , और ये निभाने आने चाहिए । इनको निभाने में त्याग की भी आवश्यकता पड़ती है । और उस अवस्था में हिचकना नहीं चाहिए , स्वार्थपरता को धकेल कर त्याग की राह पर चलना चाहिए । रिश्ते मज़बूत और कमज़ोर बनाने में लेन- देन की भी एक भूमिका होती है , इसे बीच में न आने दें क्योंकि यदि लेन -देन मध्य में हो तो यह फिर व्यापार बन जाता है , रिश्ता नहीं रहता ,जबकि रिश्ते व्यापार नहीं परस्पर मेल – जोल का नाम है ।

भारतीय संस्कृति में रिश्तों के लिए फिर वही उदाहरणस्वरूप ,सुंदरता में बेजोड़ महाकाव्य है रामायण । जिसमें हर रिश्ते को बख़ूबी दर्शाया गया है । यदि देखा जाए तो रिश्ते निभाना – जोड़ना ऐसा जो कुछ भी है वह भारतीय संस्कृति में ही देखने को मिलता है , शेष अन्य किसी संस्कृति में ऐसी और इतनी सहनशीलता नहीं देखी जाती जो रिश्तों को निभाने में निरन्तरता ला सके ।

रिश्ते निभाने में सबसे मूल कड़ी है निःस्वार्थता , कहा भी गया है —-

“जो न दे दग़ा, वो ही है सगा ‘

जो रिश्ता स्वार्थ पर आधारित होता है उसकी उम्र छोटी होती है और उसका परिणाम वेदना -टीस या शत्रुता ही निकलता है । तो हमें यह सोचना चाहिए कि हम किसी भी रिश्ते में स्वार्थ की बू न आने दें , यदि ऐसा हो तो उसे टाल देना ही ठीक है ,क्योंकि भविष्य के लिए वह सही नहीं होगा । स्मरण रहे रिश्तों में मज़बूती लाने के लिए बहुत समय लग जाता है परन्तु नासमझी के कारण टूटने में एक पल का भी समय नहीं लगता । रिश्तों को सहेज -संभाल कर रख -रखाव से रखने की आवश्यकता होती है । ये रिश्ते काँच के समान पारदर्शी और चटकने वाले होते हैं अतः”handle with care ” सदैव ध्यान रखें । 

रिश्तों में खटास और मिठास को पैदा करने को लिए हुए बहुत सी बातें होती हैं । सबसे पहले तो आपस में अपनी वाणी पर भी नियंत्रण होना चाहिए क्योंकि वाणी से ही कोई दिल में उतर जाता है और वाणी से ही कोई दिल से उतर जाता है । अतः रिश्तों में मिठास लाएँ , त्यागभाव रखें , सहनशीलता अपनायें और जीवन को सुखी एवं आनन्दमय  बनाएँ तथा रिश्तों में जुड़ाव के लिए प्यार भरे स्नेह-सूत्र को आधार बनाएँ । यही बात बहुत पहले रहीम जी ने भी कही कि ——

रहिमन धागा प्रेम का , मत तोरो  चटकाय ।

टूटे पे फिर ना जुरे , जुरे गाँठ  परी जाए ।।

परस्पर व्यवहार में किसी को सुधारने की आवश्यकता नहीं है ,जो भी बदलाव या जैसा तुम दूसरों से चाहते हो वह स्वयं से ही शुरू कर दो काम आसान हो जाएगा । ।। इति ।।

तत्त्व -तथ्य

जीवन और मृत्यु जीवन के ऐसे दो ध्रुव अटल सत्य हैं ,जिनसे मुँह मोड़ना, नकारना , अस्वीकारना संभव नहीं ।ये ऐसे सार्वभौमिक , सार्वकालिक  सत्य -तथ्य हैं  जिसे  सभी जानते हैं परन्तु  विडम्बना यह है कि फिर भी हम अनजान नहीं अनचाहवान ज़रूर हैं । इन दोनों में से मानव केवल एक छोर  को पकड़े ही रहना चाहता है , दूसरे छोर की ओर ध्यान ही नहीं करता है ।

अरे ! ये बीतते पल, बढ़ते पग , तीव्रता से किस ओर जा रहे हैं ,उसी ओर उस छोर की ओर । और यदि हम  यह मान लें कि जीवन ही मृत्यु है और मृत्यु ही जीवन है तो जगत में कुछ भी अप्रत्याशित नहीं होगा । जो होगा वह यही  कि यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है और परिवर्तन क्रियाशील होते हुए भी स्थिर है । मृत्यु स्थल की ओर प्रतिपल बढ़ते हुए जीवन जी रहे हैं । नहीं ,इसे ऐसा सोचें कि हम पुनर्जन्म की ओर बढ़ रहे हैं , एक नवीन जीवन की ओर क्योंकि आत्मा को अमर कहा गया है तो फिर इसे समझने का प्रयास करते हैं  जैसे कि आत्मा – परमात्मा ये दो तत्त्व हैं , परन्तु आख़िर ये हैं  क्या ?जिन्हें समझ पाना सामान्य मानव जीवन में संभव नहीं ।

गीता ने कहा – आत्मा अमर है , यह बात एक साधारण व्यक्ति की समझ से बाहर है । यदि कोई  रूग्ण  है और उसे पूछें कि क्या हुआ ? तो वह कहता है ‘ मैं बीमार हूँ ‘ अर्थात् सोचा जाए तो यहाँ भी उसका मैं नहीं अपितु शरीर रोगी है । कोई गिरा तो बोला ‘ मैं गिर गया ‘ यहाँ भी शरीर गिरा , आहत  हुआ और चोट लगी ।

इतने पर भी लोग समझ नहीं पाते , किसी की मृत्यु पर होने वाला शोक अर्जुन की सोच का ही शोक  होता है । जब शरीर की सीमा रेखा पार कर उस  तथ्य को तत्त्व को समझ पायें तो यह शोक -मोह नहीं होगा ।

एक उदाहरण यदि  स्पष्ट करने के लिए लें कि रामलीला देखते हुए हमने देखा कि रावण मर गया ,परन्तु वास्तव में रावण रूप में अभिनेता रामलाल तो जीवित है । और जो मरा वह रंगमंच का पात्र रूप रावण मर गया । और फिर अभिनय के बाद वह तो सुरक्षित -स्वस्थ ही रहा ,वह तो रावण का अभिनय कर रहा था । 

इसी प्रकार विभिन्न स्थानों पर  विभिन्न नाम वाले पात्रों  ने रावण का किरदार निभाया और अभिनय के बाद में आगामी वर्ष में अभिनय करने के लिए पुनः तैयार हो गये । अब इस दृष्टान्त में पात्र रूप अभिनेता को थोड़ी देर समझने के लिए मान सकते हैं  कि वह आत्मा है और उसका खोल रावण रूपी अभिनेता ही मरा । वास्तविक यथार्थ और जो सत्य रूपी पात्र है वह तो जीवित है । समझने भर के लिए आत्मा की अमरता को समझा जा सकता है मात्र उदाहरण भर  के लिए । विशेष तत्त्व के लिए तो गहन  चिन्तन की आवश्यकता है । इस संसार रूपी रंगमंच पर अपना-अपना किरदार निभाने के लिए हम यहाँ क्रियाशील हैं। यही रामलाल एक ही अभिनेता कई पात्रों का अभिनय करता है कभी रावण , मेघनाथ —–आदि । पर वह एक है आत्मा की तरह । और इस प्रकार एक ही आत्मा अपना शरीर रूपी खोल छोड़ कर दूसरे खोल में नए अभिनेता के रूप में नवीन अभिनय के लिए चली जाती है 

एक उदाहरण वर्तमान में साधारण रूप से प्रयोग होने वाली घटना से भी स्पष्ट करने के लिए लिया जा सकता है जैसे कि सभी प्रायः जानते हैं  कि आपरेशन थिएटर में जब मरीज़ को बुलाया जाता है तो नाम लेकर कहा जाता है कि मरीज़ श्यामलाल को ले आओ , और यदि दुर्घटनावश आपरेशन थिएटर में उसकी मृत्यु हो जाती है तो कहते हैं  बॉडी ले जाओ । जो कि नाशवान है ,जब तक आत्मा भीतर था तो उसका नाम श्यामलाल था अब वह इसको छोड़ कर दूसरे स्थान पर प्रवेश कर गया और उसका नाम भी कोई दूसरा हो गया , अभिनेता पात्र के समान ही उसका किरदार बदल गया । बस इसी तरह से अमर आत्मा अपना शरीर , घर कुछ भी कह लीजिए बदलता रहता है और वह स्वयं निर्लिप्त ही रहता है ।

आत्मा की इसी यात्रा को गीता में इस प्रकार से कहा गया है ——–

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्नाति  नर : अपराणि ।

तथा  शरीराणि विहाय जीर्णानि  अन्यानि संयाति नवानि देही ।।

अर्थात् जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर दूसरे नए  वस्त्रों को ग्रहण करता है ,वैसे ही जीवात्मा पुराने  शरीरों को त्याग कर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त करता है ।।इति ।।

जीवन – जंग ?

प्रत्येक सांसारिक प्राणी सुखों की चाह में अपनी आहुति देकर भी जीना चाह रहा है या इसे यूँ समझें कि हम अपने भीतर किसी चाहत को पाल कर उसकी पूर्ति के लिए निरंतर संघर्षरत हैं । जीवन एक रणक्षेत्र है इसमें जूझना पड़ता है । यह बात बचपन में समझ नहीं आती , अथवा तब तक समझ नहीं आती जब तक हमें संसार के कुरुक्षेत्र की जंग में उतरना नहीं पड़ता ।

माता -पिता की सुरक्षित छांव में पलते हुए इस वाक्य का एहसास तो क्या अर्थ भी दूर-दूर तक समझ में नहीं आता । परन्तु जैसे-जैसे बालपन धुँधला होने लगता है , अपनी समझ-समझ पर हावी होने लगती है , तो कुछ -कुछ समझ आने लगता है कि ज़िंदगी जीना इतना आसान नहीं है । कुछ लोग ऐसा भी सोचने लगते हैंकि ज़िंदगी में ‘चाहत ‘का न कोई मूल्य है न कोई अर्थ ,क्योंकि तुम वैसी ही ज़िंदगी जीते हो जैसी तुम्हारे सामने आती है ,चाहो या ना चाहो ।

यदि विचार किया जाए तो ज़िंदगी के मायने सब के लिए कभी भी एक से नहीं हो सकते । जीवन के प्रति हमारा नज़रिया वही होगा जैसा हमें अनुभव होता है । एक अमीर और मज़दूर के लिए ज़िंदगी की परिभाषा एक समान कैसे हो सकती है ?

तो क्या ज़िंदगी जीने के ढंग पर निर्भर करती है ? शायद नहीं । इसमें सबसे प्रमुख है ‘मन ‘ कहा जाता है ना कि  ” मन यदि चंगा तो कठौती में गंगा ” इस आधार पर एक साधनहीन प्राणी भी सुखी जीवन जी सकता है  जबकि एक साधन सम्पन्न  भी दुखी जीवन जीता है ।

यह निर्भर करता है हमारे मन की सोच पर , जैसा कि गीता में मन को ही नियंत्रित करने की बात कही गयी है । जिसका मन विचलित नहीं है , स्थिर बुद्धि कहलाता है मन शांतचित्त होने पर सारे कुविचार शांत होकर सद्विचार उभरने लगते हैं । और यदि मन निर्विचार हो पाए तो असीम शांति का अनुभव हो सकता है ।

अब जीवन यदि जंग है तो जंग में क्या होता है ? इसमें होती है हार या जीत , तो फिर हमारी जीवन की सोच में हमें किससे जीतना है , हमें अपने मन को ही जीतना है क्योंकि —-

“मन के जीते जीत है मन के हारे हार ”

आइए ,मन को अपने वश में करें स्वयं को इसके वश में न होने दें । अपने मन के बॉस ख़ुद बनें उसे अपना सेवक बनायें जो तुम्हारे आदेश का पालन करे ,फिर जीवन  में जीत  का भरपूर आनंद उठाएँ , चहुँ ओर मंगल ही मंगल है ।। इति ।।