जीवन – रंग

जीवन क्या है ? यह प्रश्न एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर एक नहीं हो सकता इसे किसी सामान्य भाषा में अथवा एक निश्चित रूप के दायरे में परिभाषित करना स्वयं  को छलना होगा  ।

प्रत्येक का दृष्टिकोण – नज़रिया भिन्न होगा एकमत होना कदापि सम्भव नहीं  ,हाँ इसे जिया कैसे जाय ? इसकी कोई एक सामान्य परिभाषा हो सकती है परंतु फिर भी ढंग पर आ कर बात अटक जाती है । सामान्य जीवन जीने की परिभाषा के अनुरूप आप जीना चाहें या न ,यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर है और यही ढंग हमारे मनोभावों को उद्वेलित करता है ।और इसी उद्वेलन से जुड़ा है मानवीय सुख और दुःख ,चिरसुख और चिरदुख सांसारिक जीवन में हो नहीं सकता ,दोनों ही का मिलना अनिवार्य है ।

संसार में द्वंदों से हम बच नहीं सकते इनसे सामना होना अवश्यंभावी है  ।उपाय क्या है ? फिर वही सिद्ध सत्य गीता का अध्ययन  ,विचार ,मनन सोचने पर मजबूर करता है कि द्वंदों में परस्पर संतुलन अथवा दोनों स्थितियों  में समभाव ही हमें उद्वेग से बचा सकता है । और उसके बाद एक शांत और सुखद जीवन की कल्पना नहीं ,सच्चाई को अपने गले लगाया जा सकता है । ख़ुद को छोड़ खुदा से जुड़ना और भी एक सरल  मार्ग हो सकता है ।जिससे जीवन को  शांत जीवन पथ पर ले जाया जा सकता है । यदि यह कठिन मार्ग है ,तो इतना तो हो ही सकता है कि जीवन में जो भी मिला ,उसी में संतोष करना सीखें ,न कि जो नहीं मिला उस की चिंता में जीवन गँवाए ।

सच्चा साथी ईश्वर है मानव कभी भी अकेला नहीं ।वह सर्वशक्तिमान सदा ही हमारे साथ है, कभी जीवन में जब किसी समस्या का समाधान न सूझे तो ,अपने सच्चे साथी को पुकारिये मदद के लिए ।ऐसा हो नहीं सकता कि तुम्हें निराश होना पड़े ।संकट में की गयी पुकार ,कोई आपका बंधु सुने न सुने ।उस सच्चे बंधु से प्रार्थना कीजिए प्रार्थना व्यर्थ नहीं जाएगी ।

जीवन में निरंतर उच्चादर्शों का समर्थन करना ही अपने जीवन को सँवारना है ।मनुष्य जीवन संसार में सर्वश्रेष्ठ है ।न जाने कितने कष्टों के उपरांत इस की प्राप्ति हुई ।इसकी महत्ता को समझ उसे सफल बनाने का सतत प्रयास करना चाहिए ।कर्तव्य पथ पर अग्रसर होते हुए ,सकारात्मक सोच को बनाए रखना ही सहज जीवन जीने का एक उपाय है ।

जीवन एक यात्रा है ,और यह यात्रा कैसी हो ?सुखद या दुखद यह इस यात्रा के पथिक के अपने हाथ में है ,कि वह अपने यात्रा पथ को फूलों से सुसज्जित करता है या काँटों को बिखेर कर अपने पग लहू लुहान करता है ।

जीवन में संचारित होती हुई अनुभूतियाँ हमारी मनोभावनाओं को झकझोरती हैं ,उस के वशीभूत होकर  मानव भावुक हो उठता है । भावुक होना एक अच्छा गुण हो सकता है ।परंतु कोरी भावुकता का मन मस्तिष्क पर आधिपत्य ,न केवल स्वयं का अपितु सम्बंधित जन का जीवन भी दूभर कर देता है ।निरी भावुकता किसी काम की नहीं ।क्योंकि इसमें कर्म का कर्तव्य का अभाव होता है । समवेदनशील मनुष्य क्रिया वान हो कर ही ,किसी के लिए उपयोगी हो सकता है ।अपने जीवन में कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ सकता है ———

हे मानव !

तू कर्तव्य पथ पर रह रत ,

बाधा से कभी घबरा मत ।

जब टूटेगी जीवन डोर ,

नहीं आएगा नज़र कोई छोर ।

रात ही देखेगा सब ओर ,

न जानेगा होता है क्या भोर ? 

 

जीवन

 

दिन निकलता है 

और रात भी होती है ,

फिर 

अगले दिन के इंतज़ार में 

यूँ ही ज़िंदगी तमाम होती है ।

जीवन में भी आते हैं

इसी तरह दिन और रात ,

कभी पूर्णिमा तो कभी 

अमावस की रात होती है ।

या 

कभी चाँद रहित  तो कभी चाँद रात 

होती है ,

सोचा कभी –

जीवन एक पुस्तक है ,

जिसको पढ़ते -पढ़ते कब 

कौन सा आख़िरी पन्ना बन जाए ,

वहीं बंद कर पुस्तक 

पाठक इस जहाँ से 

विदा हो जाए ।

अगले सफ़र पर अपनी ,

अनदेखी यात्रा पर ।

सृष्टि नियम है जीवन का ,

आना जाना तो लगा ही रहता है ।

समझ कर इस बात को ,

ख़ुश हो जा बंदे तू क्यूँ   उदास रहता है ।।

इति 

सागर

सागर के अंतर की थाह किसने पायी है ?

कहने को तो ये दुनिया 

नाप ली हमने , 

जो विधाता ने बनायी है ।

सागर की सीमा नहीं कोई ,

इतना विशाल कि पता नहीं 

इसका कोई ओर – छोर ।

लगता है भाव भरे  हैं इसके अंतस्तल में ,

तभी तो गर्जना और 

हुंकार सुनायी देती है ।

अम्बर समेट कर इसकी  पीर की उष्णता

अपने अंतर में ———–

लौटा देता है शीतल कर 

बरसा वापस उसी में ।

सागर सा दरिया दिल ,

कौन होगा ?

जिसमें प्रलय नहीं आती 

अगर आ जाती ,

तो यह सृष्टि न रह पाती ।

सागर है अथाह 

नहीं पा सकते इसकी थाह ,

हृदय टटोलो अपना तो 

शायद पता चले कि ,

इसके अंतर में क्या भरा है 

थाह – आह – या कोई  चाह   ?

इति 

 

मक़सद या लक्ष्य

सामान्य रूप से जीवन का सपना बुनने वाले और उस दृश्य की कल्पना करने वाले लोगों की ज़िंदगी मिलती जुलती होती है ।और बहुधा साधारण सोच से ही इंसान प्रारम्भ करता है परंतु वह कब विशेष हो जाए अचानक इसका एहसास परिणाम के बाद लगता है ,और इंसान यह सोचने पर विवश हो जाता है ऐसा कैसे हो गया न कि यह कि ऐसा क्यों हो गया ?

यदि देखा और सोचा जाय तो  निचोड़ रूप में जो समझ आता है कि इंसान जैसा और जितना सोचता है वैसा कभी कुछ होता है और  कभी नहीं भी होता । जीवन में आने वाली परिस्थितियाँ  कह  लीजिये या रूकावटें  । मेरी दृष्टि में शायद ये ही बाधाएँ बन कर मनुष्य के सामने आ खड़ी होती हैं और एक चुनौती देती हैं किअब चुन क्या करना है ?  बस यहीं परीक्षा होती है । अक्सर उन परिस्थितियों को देख कर लिए गए निर्णय बाद में हमें ग़लत भी लग सकते हैं कि ऐसा न करके ऐसा किया होता तो शायद  सही रहता  ।यह हमारी सोच पर है । वैसे जो अतीत हो चुका उस में से यदि  ग्राह्य है ,तो उसे लिया भी जा सकता है परंतु केवल  पछताने के लिए अतीत के दामन का छोर पकड़ना मूर्खता है ।क्योंकि उसे तो अब पलटा नहीं जा सकता परंतु सबक़ लिया जा सकता है ,कि यदि पुनः वह परिस्थिति आ गयी तो हमारे निर्णय क्या होंगे ? बेशक ऐसी पुनरावृति की  संभावना शून्य के  बराबर होती है ।

निर्धारित लक्ष्य या मक़सद को पाने के लिए दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है ।यदि संकल्प मज़बूत है डटे रहने की ताक़त है तो कोई भी अपना मक़सद निर्बाध गति से पा सकता है ,क्योंकि किसी भी लक्ष्य की पूर्ति के लिए हमें चुनौतियों से दो चार होना पड़ता है कहा भी जाता है ——-

लहरों से डर कर नौका कभी पार नहीं होती ,

कोशिश करने  वालों की कभी हार नहीं होती ।

एक टहनी एक  दिन पतवार बनती है ,

एक चिंगारी दहक अंगार बनती है ।

जो सदा रौंदी गयी बेबस समझ कर ,

एक दिन मिट्टी वही मीनार बनती है ।।

याद रखो किसी भी कार्य की सफलता की  सीढ़ी पर चढ़ने के लिए चाहिए लगन मेहनत और  धैर्य बाक़ी सब सहारे ख़ुद ब ख़ुद चले आएँगे ।

इति 

 

 

ओ भारत के भारतीयों

ओ भारत  के भारतीयों !

भारत में रहने वालों

जागो और निज को देखो भालो ,

क्यों अपने संस्कार छोड़ के

बिन साँस लिए दौड़ के ,

उस  देश के पीछे भाग रहे

जो संस्कारहीन प्रतिमाओं से

अपने अंगों में भर आग रहे ।

तुम्हारी हर सुबह है एक पर्व 

तुम करो इस बात पर गर्व ,

दिनकर उदय होता है पूर्व में

और

सदा डूब जाता  है पश्चिम में ,

गुम हो जाता है पश्चिम सिर्फ़ 

पश्चिम में ।