मैं सही हूँ

एक लेखक की उक्ति ‘चाहे कोई कितना भी विद्वान क्यों न हो एक अकेले व्यक्ति का निर्णय कभी भी सही नहीं हो सकता !’

उपर्युक्त उक्ति में एक बहुत ही गम्भीर बात कही गयी है ,यदि उस पर विचार करें तो समझ में आता है कि आज के इस दौर में अपने चारों ओर देखने पर इस उक्ति से उलट देखने को मिलता है ,क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अपने निर्णय या कथन को सही मानता है ,और यह सोचता है कि मैं ही सही हूँ ,दूसरा ग़लत है ! जबकि दूसरा भी यही सोचता है कि ‘ मैं सही हूँ ! ‘

प्रत्येक व्यक्ति अपनी दृष्टि से अपनी जगह सही है ।इसमें समस्या केवल उस समय   उत्पन्न होती है जब हम दूसरे को ग़लत समझते हैं और स्वयं को सही स्थापित करने का प्रयत्न करते हैं ।

किसी भी पहलू पर विचार करें तो पाएँगे कि प्रत्येक की सोच व दृष्टि भिन्न -भिन्न होती है ‘जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि ‘ सड़क पर पड़ी हुई ग़िन्नी को या हीरे को देखने वाले तीन प्राणी -गँवार ,सुनार,बिल्ली ।सोचिए क्या उनका देखना एक समान है ?नहीं ।एक बच्चा नहीं जानता जवानी क्या है ?जवान नहीं जानता कि बुढ़ापा क्या है ? और बूढ़ा भी नहीं जानता कि मृत्यु क्या है ? हालात में पड़े बिना सही ज्ञान नहीं होता ।

इसी प्रकार जब हम किसी बहस में फँसते हैं उस समय हम अपनी पूरी ऊर्जा दूसरे को समझाने में व्यर्थ करते हैं या लगाते हैं और कहते हैं कि वो हमारी बात समझ नहीं रहा जबकि वास्तविकता यह होती है कि वो वैसा नहीं समझ रहा जैसा तुम चाहते हो ।और हमारी मंशा स्वयं को सही साबित करने की होती है क्योंकि कोई भी अपने आप को ग़लत होता हुआ नहीं देखना चाहता ।यदि सोचा जाए तो इसके पीछे की सच्चाई यह है कि प्रत्येक का स्वयं को सही स्थापित करने का कोई न कोई कारण रहता है ,अगर कारण न भी हो परन्तु उनकी स्वनिर्मित एक धारणा होती है और उसे वे अपने मस्तिष्क में दृढ़ता से जमाए होते हैं और उससे टस से मस नहीं होना चाहते ।और यही विवाद ,फ़साद और झगड़े की जड़ है ,छोटे नहीं बृहदतर स्तर पर भी देखा जाए तो पूरे विश्व या जहाँ के मूल में यही एक बात निकल कर सामने आती है ,हर कोई दूसरे को ग़लत समझ कर स्वयं को सही स्थापित करने में प्रयासरत है ।बेहतर होगा दूसरे को समझाने के स्थान पर स्वयं समझने का प्रयास करें  ।

केवल यहीं पर बात नहीं रूकती अपितु स्वयं को सही मानने वाले को पूरा विश्वास है कि इससे अलग कुछ भी सही नहीं हो सकता ।ऐसा विचार या धारणा पूर्व स्थापित होती है ,जिसे सत्य नहीं ठहराया जा सकता ।क्योंकि जब मन में विश्वास जम जाता है तो बौद्धिक प्रयास को विराम लग जाता है ,आगे की सोच रूक जाती है ,उस समय का निर्णय या यह कहना मैं सही हूँ यदि ग़लत नहीं तो सत्य से काफ़ी दूर होगा ।इस में एक बात जो उभर कर सामने आती है कि प्रत्येक व्यक्ति का सही या ग़लत उसकी अपनी पूर्व की मेमोरी -memory के आधार पर ही निश्चित हुआ है और दूसरी बात प्रत्येक की समझ भिन्न होती है ,इसीलिए कहते हैं ‘जान लो या मान लो ‘पर होता क्या है जिसे हम जानते नहीं उसे हम मानते भी नहीं ।

एक वैज्ञानिक पूर्व निर्धारित धारणा के आधार पर कभी भी कोई खोज नहीं कर सकता ।क्यों ? सच्चाई क्या है ,इसको जानने ,ढूँढने में समय की आवश्यकता होती है और ‘मैं सही हूँ ‘समझने की धारणा और दूसरे को ग़लत समझने में हम इस तथ्य से वंचित रहते हैं क्योंकि देर सवेर तो सत्य सामने आता ही है और अपनी-अपनी दृष्टि से कभी हम सही और कभी दूसरा भी सही हो सकता है ।’मैं सर्वज्ञ हूँ ‘या मुझे सब कुछ मालूम है इस धारणा के दामन को छोड़ कर विचार करना होगा ।अतः यह स्वीकार करने में संकोच नहीं करना चाहिए कि हम यह जानते हैं और हम यह नहीं जानते -इस स्वीकृति से ही हम इस प्रवृति से मुक्ति पा सकते हैं ।और ऐसा मानना अपने आपको अपनी ही दृष्टि में ऊपर उठाने का सफल प्रयास होगा ।

इस बात का सदैव ध्यान रखना चाहिए कि इस संसार में हमारा जीवन एक तय अवधि तक का ही है या हमारा जन्म एक्सपायरी डेट के साथ ही होता है ,और इसी अवधि में हमें सफलता-विफलता ,सुख -दुःख आदि का निर्वाह करना है ।प्रत्येक व्यक्ति में अपनी-अपनी सम्भावनाएँ ,योग्यताएँ और गुणवत्ता भी भिन्न-भिन्न होती है और वे न्यूनाधिक हो सकती हैं ।कोई भी अपने आप में सम्पूर्ण नहीं होता ,जब तक जीवन है सीखने की प्रक्रिया चलती रहती है ।इस प्रकार जीवन में सीखने ग्रहण करने की आदत को निरन्तर अपनाया जाए तो हम वयवृद्ध होने के स्थान पर ज्ञानवृद्ध बन पाएँगे ,यह विचार मनुष्य को चिर युवा बनाए रखने में सहायक होगा ।।इति ।।