इच्छा

महात्मा बुद्ध से किसी ने एक बार पूछा कि ‘ स्वर्ग क्या है ? उत्तर – इच्छाओं का अन्त   महात्मा बुद्ध के उत्तर सदैव अति संक्षिप्त शब्दावली में हुआ करते थे पर उस उत्तर की गहराई तक पहुँचने के लिए तो —

”जिन खोजा तिन पाईयाँ गहरे पानी पैठ “ की उक्ति ही सार्थक सिद्ध होती है ।

यदि इच्छाओं के विषय में सोचने लगें तो वे असीमित हैं जिनका कोई अन्त नहीं ।एक को पूरा किया तो दूसरी का आविर्भाव हो जाता है और इस तरह से पूरा करते करते जीवन बीत जाता है ।पल भर अपनी भावनाओं को रोककर तनिक रुकिए और सोचिए कि जन्म से लेकर अब तक आपने जीवन में क्या किया है ? केवल और केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति , इन्हीं को पूरा करने में समय बीता जा रहा है और ये इच्छाएँ भी समय और वय के अनुसार बदलती रहती हैं ।

विचार कीजिए अतीत को तनिक टटोलिए क्या आज भी वही पहले सी इच्छाएँ हैं ?नहीं समय परिवर्तन के साथ -साथ वे भी परिवर्तित हो चुकी हैं । एक बच्चे में भी इच्छाएँ होती हैं  ,वैसे बच्चों में केवल इच्छाएँ ही होती हैं क्योंकि उनमें समझ इतनी नहीं होती और धैर्य का भी अभाव होता होता है वे अपने मन में उठने वाली इच्छाओं को तुरन्त पूरा होता हुआ देखना चाहते हैं ।

कभी कभी समझ लिया जाता है कि इच्छापूर्ति से ख़ुशी मिल जाती है उदाहरण के लिए -एक बच्चा जो अपने मनचाहे खिलौने से खेल रहा है परन्तु सामने वाले बच्चे को देखता है जो कि वह भी अपने मनचाहे खिलौने से खेल रहा है और ख़ुश है अब पहला सोचता है कि वो खिलौना ज़्यादा अच्छा है क्योंकि उससे वो बच्चा बहुत ख़ुश है तो क्या हुआ ? उस खिलौने को पाने की इच्छा उत्पन्न हो गयी और अपने खिलौने से खेलने की इच्छा ख़त्म ।फिर वो भी मिल गया तो एक और नया पाने की इच्छा जागृत हो गयी ,इसी तरह से क्रम चलता रहता है और बड़ा हुआ तो और इच्छाएँ जन्म ले लेती हैं ,बच्चे ,युवा और बुज़ुर्ग सब की इच्छाएँ भिन्न -भिन्न और मनुष्य इसी भटकाव में भटकता अपना जीवन पूरा कर जाता है ।

मनुष्य जीवन में यह समझता है कि इच्छाओं की पूर्ति से ही मैं ख़ुश रहूँगा या हो सकता हूँ  ,और इसी को ध्यान – लक्ष्य बना कर प्यासे मृग की भाँति मृग- मरीचिका से प्यास बुझाने की तलाश में भ्रमित हुआ घूमता रहता है ।परन्तु अन्त तक प्यासा और तृषित ही रहता है ।सम्पूर्ण जीवन भर हम अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए क्यों तत्पर रहते हैं क्योंकि हम यह सोचते हैं कि इच्छापूर्ति से ख़ुशी मिलेगी परन्तु यह भूल जाते हैं कि जब से पैदा हुए हैं यही तो कर रहे हैं क्या आज तक हमारी इच्छाएँ पूरी हुई हैं ? नहीं तो फिर इनके पीछे भागना छोड़ो ,इन पर विराम लगा दो क्योंकि ये तो अनवरत एक के बाद एक सिर उठाती रहेंगी ।

युवावस्था में तो यह वेग अतिप्रबल होता है और ये इच्छाएँ भी दो प्रकार की होती हैं एक जो हमें ऊँचाइयों तक ले जाएँगी और दूसरी  नीचे गिरा देंगी ।हमें अपनी कमज़ोर इच्छा को अपनी ताक़त बना कर मज़बूत करके उसे सही दिशा में ले जाना होगा ।अपने शरीर को सही रखना ही दिमाग़ को दुरुस्त रखना है ।पिछले दिनों एक समाचार पढ़ने को मिला कि एक व्यक्ति जिसको पता चला कि वह एच आई वी से पीड़ित है और लोग भी उससे दूरी बनाने लगे हैं ,कोई उससे बात भी नहीं करता है ।उसने अपने उसी कमज़ोर होते शरीर को योग और व्यायाम से इतना बलिष्ठ बनाया कि विश्व चैम्पीयन बना ,और अपनी बीमारी से मुक्त हो कर अन्य लोगों को भी अब सिखाता है कि कमज़ोर मत बनो स्वयं को स्वस्थ बनाओ ।अपनी इच्छा शक्ति को अपने निश्चय से दृढ़ बनाओ ,और जीत हासिल करने के लिए जी जान  से जुट जाओ ।सफलता अवश्य मिलेगी ,मुझे देखो और आगे बढ़ो ।

जो इच्छा युवावस्था में शरीर ,समय और धन को बर्बाद करती है उसे ही सृजनात्मकता में लगाना चाहिए ।अपने ध्यान को सही दिशा में लगा कर जीवन को बर्बाद होने से बचाना चाहिए ।और अपनी इच्छा को निर्माण में लगाएँ कन्स्ट्रक्टिव बनाएँ ,क्योंकि इससे पूर्व कि यह किसी व्यसन या लत का रूप धारण कर ले ।यह कभी न भूलें कि जीवन में कुछ करने-पाने के लिए दर्द सहना पड़ता है ।अतःक्षणिक आनंद के पीछे कभी मत भागो ।

यह हमें ही सोचना है कि कहाँ और कब इन इच्छाओं को स्टॉप कर देना है ,और स्वयं को क़ाबू में रख कर अपने मन को नियंत्रित करना है ।क्योंकि इच्छाओं की पूर्ति हमें केवल जो ख़ुशी देती है वह अस्थायी है ,थोड़ी देर के लिए है ।यदि स्थायी ख़ुशी और प्रसन्नता प्राप्त करनी है तो इस क्षणिकता को छोड़ कर उस ख़ुशी और आनंद की तलाश करनी होगी जिसे पाने के बाद कुछ और पाने की इच्छा नहीं रहती तो फिर सोचना क्या ,अभी से उस मार्ग के पथिक बन कर यात्रा प्रारम्भ कर देनी चाहिए ,और उस मंज़िल तक पहुँच जाना चाहिए जिसे पाकर इच्छाओं का नामोनिशान मिट जाता है ।परमानंद और आनन्द ही आनन्द होता है और इन सांसारिक इच्छाओं को पाने की इच्छा शून्य हो जाती है और वही जीवन का लक्ष्य है ।

मनुष्य तो इस सांसारिक मायाजाल में उलझ कर इच्छापूर्ति को ही सर्वस्व समझ बैठता है ।अतः समय रहते संभल कर सही मार्ग पर पग रखते हुए सही गन्तव्य पर पहुँचे और अपने जीवन को सफल बनाएँ ।

।।इति ।।