मोह

जीवन में शांति ,सुकून और ठहराव चाहिए तो इस मोह को भूलना -छोड़ना होगा ,इसके रहते तुम्हारी इंद्रियाँ सबल नहीं बन सकती ।यह अनुभूति नहीं अकाट्य तथ्य है,मोह किसी के भी प्रति हो सकता है अर्थात् सजीव या निर्जीव वस्तु के प्रति ।अन्ततःयह धीरे -धीरे तुम्हारी इंद्रियों को भीतर ही भीतर चूसता रहता है और तुम जीते हुए भी पल पल मर रहे होते हो ।

यदि देखा जाए तो मोह या आसक्ति प्रत्येक व्यक्ति में भिन्न -भिन्न हो सकती है यथा माँ अपने बारे में सोचे तो बच्चों का मोह उसके मस्तिष्क और हृदय पर पूरी तरह हावी होता है और वही एक फाँस उसे अंदर ही अंदर चुभती है लाख निकालने का प्रयास करने पर भी उसके लिए निर्मोही हो पाना संभव नहीं होता ।

यह एक माँ के लिए ही नहीं अपितु प्रत्येक मोहग्रस्त व्यक्ति के  लिए यह अनुभूति गहरी होती है ।और सब न चाहते हुए भी इस मोह के मायाजाल में फँसे रहते हैं क्योंकि मुद्दा भावनाओं से जुड़ा है ।यदि दिमाग़ से सोचा जाए तो तुम्हें समझ आएगा ,पर वह क्षणिक बुद्धि के करतब के अतिरिक्त कुछ भी नहीं होगा ।अगर संसार में चैन -सुख-शांति चाहिए तो स्वयं अपने आप को मज़बूत बनाओ और इस मोह के मायाजाल को उतार फेंको ।गीता अध्याय पढ़ो किस प्रकार से कृष्ण ने अर्जुन का मोह भंग किया और उसे युद्ध करने के लिए तैयार कर दिया ।यह जगत-संग्राम संसार का युद्ध यदि जीतना है तो इस मोह को दूर कर निर्लिप्त-निरासक्त हो कर इस रण क्षेत्र में उतरना होगा अन्यथा यूँ ही हिचकोले खाते पल-पल गुज़रते काल को समाप्त होते देखना होगा ।अतः संभल कर अपनी इंद्रियों को संयमित कर उन्हें जीत कर वास्तविकता के अर्थ पटल को समझ कर प्रकाशमयी भूमिका में उतरना होगा ,वरना यह जीवन जीवन न हो कर कुछ और ही बन जाएगा ।

आओ प्रयास करें अभी से इस मोह से किस तरह से मुक्ति पा कर स्वतंत्र निर्भय जीवन जिया जाए ।यह हमारे मोह बन्धन का जाल है इसके लिए स्वयं को साहसी बना अपने मज़बूत मन के शस्त्रों से इन बंधनों को काट फेंकना होगा और स्वयं को स्वतंत्र करना होगा ।

।।इति ।।

 

धोखा

‘जो न दे दग़ा ,वो ही है सगा ”

इस संसार में ज़िंदगी का सफ़र तय करते हुए बहुत से दृश्य आते हैं। कुछ सुहाने ,लुभावने और कुछ ऐसे भी नज़ारों से दो चार होना पड़ता है ,जिनकी पुनरावृति हम कतई नहीं चाहते ।

इस सफ़र में हमें बहुत से यात्री मिलते हैं कुछ रिश्तों के सम्बंधी होते हैं और कुछ ऐसे बिना किसी रिश्ते के होते हैं परंतु जो रिश्तों से भी बढ़कर कुछ बन जाते हैं ।कई  बार ऐसी कड़वी घूँट को भी पीना पड़ता है जिसके बारे में हमने कभी सोचा नहीं होता है ।चलते -चलते हम किसी के प्रति अगाध विश्वास करने लगते हैं परंतु हमें कई बार उसी से धोखा मिलता है ।ऐसा हम समझते हैं ,पर नहीं यह धोखा वह इंसान हमें नहीं देता क्योंकि कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे को धोखा नहीं दे सकता ,कहने का अभिप्राय यह है कि अपने से स्वयं से बढ़कर कोई किसी को धोखा नहीं दे सकता हम जब भी किसी को धोखा देने की सोचें तो समझ जाना चाहिए कि हम स्वयं को ही धोखा दे रहे हैं ।स्पष्टता के लिए इस प्रकार समझ सकते हैं ,जैसे हम किसी को कोई बात बता रहे हैं सामने वाला व्यक्ति तो उसे ही अक्षरश : सत्य समझता है ,क्योंकि उसे इस बात का इल्म भी नहीं है कि इस में कुछ झूठ मिलाया गया है परन्तु उस झूठ को बताने वाला जानता है कि इसमें कितना सच और कितना झूठ है ?अतः तो कौन किसको धोखा दे रहा है ,जो कि देर सवेर कभी न कभी उस के सामने आएगा उस समय उसे बर्दाश्त करना बहुत कठिन हो जाएगा ।

सारांश रूप में यही समझना चाहिए कि स्वयं को धोखा न दें क्योंकि हम किसी को धोखा नहीं दे सकते अतः स्वयं को धोखा देने से बचें ।सगा कोई और नहीं हम ही अपने सगे हैं ।

कहा गया है मन -वचन -कर्म से एक होता है सज्जन ,और मन-वचन-कर्म से भिन्न होता है दुर्जंन ।अतः स्वयं का हित चाहने वाले धोखे का दामन छोड़ ईमानदारी का मार्ग थामें इसी में कल्याण होगा ।

।।इति ।।