युवा एवं प्राथमिकता

ज़िंदगी समस्याओं का जंजाल है और मनुष्य उस जाल में से निकलने के लिए छटपटाता हुआ जीव है ,जो प्रतिपल उस में से निकलने के लिए सही मार्ग को चुनने की जद्दोजहद में लगा  रहता है । जीवन में बहुत से कार्य होते हैं परन्तु उनमें से क्रमानुसार  प्राथमिकता के आधार पर चुनना- चयन करना भी हमारा ही कार्य होता है कि कौन सा कार्य क्रमानुसार करने में पहले होना चाहिए और कौन सा बाद में ?

 

एक युवा के लिए सर्वप्रथम उसकी नौकरी-आजीविका -जॉब भी हो सकती है ,तथा इसके साथ जुड़ी और भी बातें होती हैं या हो सकती हैं जैसे अभी कहा नौकरी -यह तो ड्यूटी है करनी ही करनी है परन्तु इसके अतिरिक्त और भी ड्यूटीज़  होती हैं ज़िम्मेदारियाँ होती हैं जो इसके साथ ले कर चलनी होती हैं । वे भी अनिवार्य हैं जो करनी पड़ती हैं चाहो या ना चाहो । जब शादी होती है उसके बाद समझ में आता है कि उन सब कार्यों में  क्रम से तालमेल बिठाना पड़ता है । और अगर समझना चाहो तो मेरी नज़र में जैसे सप्ताह में सात वार होते हैं और ऐसे ही मानो आठवाँ वार  होता है परिवार ,यह मैंने कहीं पढ़ा है । इसे कभी मत भूलो ——FAMILY 

F—-Father

A—-And

M—-Mother

I—-I

L—-Love

Y—-You

यदि सोचें तो यह फ़ैमिली भी हमारी ज़िम्मेदारी के क्रम में शामिल है , हम इसको नज़रंदाज नहीं कर सकते । प्रत्येक युवा का यह फ़र्ज़ है कि वह अपनी अन्तरात्मा में झाँक कर टटोल कर देखे या उसे देखना चाहिए कि मैं अपनी फ़ैमिली को धोखा तो नहीं दे रहा  उसके प्रति भी ईमानदार हूँ , फ़ोकस्ट हूँ , या मैं कहीं अपने स्वार्थ में उन्हें चीट कर रहा हूँ । यदि ऐसा हो तो संभल जाना चाहिए क्योंकि जब जागो तभी सवेरा । वैसे भी “मन में अपराध बोध लेकर जीना ज़िंदगी को बोझिल बनाना है ।”

ग़लती हरेक से होती है ,महान वह है जो समय रहते अपनी ग़लती को सुधार ले । और सही राह पर चल कर अपने जीवन को सफल बनाए ,क्योंकि हमेशा सही राह पर चल कर ही इंसान लक्ष्य तक पहुँच पाता है । आज तक इतिहास में सफल हुए व्यक्ति सही राह ,सही आदत और सही आचरण से ही महान बनें हैं । प्रत्येक युवा का यह कर्तव्य है कि सजग रह कर , विचारपूर्वक अपने लिए सही राह का चुनाव करे । परन्तु कई बार सतर्क रहते हुए भी ग़लत राह पर चल पड़ते हैं ,ऐसे में घबराने की ज़रूरत नहीं है अपितु समझदारी से काम लेना चाहिए ।

अगर कभी राह में भटक जाओ या राह दिखायी न दे तो अपने से बड़ों की राय ली जानी चाहिए । माँ- बाप को भी वृद्धावस्था में सहारे की ज़रूरत होती है ,उनका सहारा बन कर पुण्य कमायें और अपना जीवन सफल बनाएँ ।और पूर्ण श्रद्धा से  उनकी सहायता  करते हुए ही सही राह पर चल कर लक्ष्य तक पहुँचना चाहिए अन्यथा ग़लत रास्ता एक भटकाव है जिसमें मंज़िल नहीं मिलती , पछतावा मिलता है हाथ कुछ नहीं आता ।समय रहते संभलने में ही भलाई है वरना फिर अन्त में सोचोगे ——

“अब पछताए क्या होत ,जब चिड़िया चुग गयी खेत ।”।।इति ।।

 

जीवन -मृत्यु

प्राचीन काल से लेकर आज तक मनुष्य इसी प्रश्न की तलाश में है कि जीवन क्या है ? और मृत्यु क्या है ? ऋषि मुनि अपनी -अपनी समझ और विचारधारा के अनुसार , अनुभव के आधार पर विभिन्न मत रखते हुए इस संसार को छोड़ कर चले गये ।

सृष्टि के नियम में ये दोनों बातें जीवन और मृत्यु अटल हैं ,इसे कोई भी मिटा नहीं सकता ।गीता में कहा गया है ——-

“जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं  जन्म मृतस्य च ।” क्योंकि इस मान्यता के अनुसार जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है ।

जन्म लेने के साथ ही मानव जीवन की मृत्यु की ओर जाने वाली कड़ी आरम्भ हो जाती है या यूँ कहें कि उलटी गिनती शुरू हो जाती है । संसार में जन्म लिया और मनुष्य की यात्रा प्रारम्भ ,कौन सी यात्रा है ?यह यात्रा ही मृत्यु की ओर जाने की है अर्थात् जब तक मृत्यु नहीं आती तब तक उस यात्रा को पूरा करना है । और प्रश्न है कि इस यात्रा को मंज़िल तक कैसे पहुँचाया जाए ?

सारी जद्दोजहद इसी जीवन को जीने में है कि जीने की कौन सी राह चुनी जाए ? किस पर चल कर सुकून से जीना संभव है ? इसका निर्णय मनुष्य जीवन में आने वाली परिस्थितियों को देख कर परख  कर करता है और अपनीं राह चुनता है ,और उस राह में सुख -दुःख सभी आते हैं उन्हें किस तरह से अपने योग्य -अनुरूप बनाए ताकि जीवन की राह आसान हो सके ,उसके सारे प्रयास इसी सोच पर केंद्रित रहते हैं कि कठिनाईयों को कैसे पार करें । जीवन में आने वाली छोटी-छोटी बड़ी से बड़ी बाधाओं को कैसे पार किया जाए और साथ ही छोटी -छोटी ख़ुशियों में कैसे आनंद मनाया जाए ?इन सब का आधार मानवीय सोच विचार ही है ,इसी चिंता-चिंतन -मनन में ही जीवन बीत जाता है ।

परिणामतः देखें तो सुकून भरी राह यही हो सकती है कि मनुष्य वर्तमान में जिए ,बीते का ग़म न आगे की फ़िक्र यही है ज़िंदगी इसलिए 

“बीति ताहि बिसार दे ,आगे की सुधि ले ”

अतःवर्तमान में जीते हुए अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर रहो ,किसी का भला कर सको तो करते चलो । इति ।