सम्बन्ध

परिवार मानव निर्मित इकाई नहीं है । उसे उस परम पिता परमात्मा ने रचा है ।कौन -कौन उसके सदस्य बनने हैं , उन सबका चुनने या बनाने वाला ईश्वर है । मनुष्य का तो यह कर्तव्य बनता है कि वह उस विधाता की इस देन को  सहेज कर रखे । उसने जो रिश्ता बनाया है और जिस रिश्ते में बांधा है उस रिश्ते का मान रखें । रिश्ते निभाने की चीज़ है , रिश्ते निभाने चाहिए और उनका आधार प्रेम के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है ।

माता पिता और बच्चे यह परिवार का सर्वप्रथम मूल अंश है ,इसको संगठित कर एक मज़बूत रूप देना चाहिए । प्रत्येक सदस्य को सोचना चाहिए कि हमें भगवान ने जोड़ा है अतः हमें जुड़ के ही रहना है  । हमारे सभी कार्य इसी दिशा में होने चाहिए , सदैव ध्यान रखना चाहिए कि मतभेद बेशक हो जाएँ मनभेद न हों । बड़े छोटों को आशीर्वाद – दुआएँ देते रहें और छोटे बड़ों  का सम्मान करें , साथ ही साथ सहनशील बनें । क्योंकि यह मान कर चलें कि यह परिवार ही है ,जिसमें बिना स्वार्थ के प्यार मिलता है । इससे बाहर जो भी रिश्ते हैं सब में स्वार्थ घुला-मिला रहता है । परिवार में चाहे कितनी भी लड़ाईं हो जाए ऊँच-नीच हो जाए परंतु दिलों में प्यार कम होने सम्भावना शून्य रहती है । बच्चे माँ बाप को कई बार कटुता से बोल देते हैं , परन्तु माँ बाप के हृदय में उनके प्रति कभी कड़वाहट नहीं आती । क्योंकि यह प्राकृतिक है कि वे सदैव उन पर अपनी ममता ही लुटाते है । यही उनका स्वभाव है , स्वभाव को बदला नहीं जा सकता देखिये ——-

“बादल समुद्र का खारा पानी लेकर भी वर्षा के रूप में मीठा पानी ही बरसाता है ।”

“साँप मधुर दूध पी कर भी विष उगलता है ”

परिवार के प्रत्येक सदस्य को हमेशा यह सोचना चाहिए कि मैं अन्य सदस्यों के लिए और क्या कर सकता हूँ । परिवार में प्रेम प्यार का होना बहुत ज़रूरी है । जहाँ पर प्रेम होता है वहीं पर लक्ष्मी और ख़ुशियाँ भी स्थायी रूप से रहने लगती हैं । इसके अभाव में घर-घर नहीं रहता है , नित्य क्लेश के कारण सब कुछ समाप्त हो जाता है बरकत नहीं रहती ।सांसारिक  सम्बन्धों का  नियम है  पारस्परिक आदान – प्रदान । कहा जाता है कि जो पाना चाहते हो उसे ही देना आरम्भ कर दो वह स्वतः ही तुम्हारे पास आ जाएगा यथा  प्यार ,पैसा ,वस्त्र,नफ़रत,आनंद ,सुख -दुःख,कुछ भी  जो चाहिए देना शुरू कर  दो ।

निष्कर्ष यही है कि परिवार का आधार प्यार है इसको फैलाने और बनाए रखने के लिए सतत प्रयत्नशील रहें ,सहनशीलता अपनाएँ ,सन्मार्गी बनें और बनाएँ जिससे परिवार में ख़ुशियाँ लहलहायें  ।।इति ।।

पड़ाव

पावन अमृत कलश के जल बिंदु से  स्रष्टा के सृजन का अनमोल मोती सा जीवन पाकर  मानव धन्य हो गया । जीवन  के आरम्भ में शैशव में  क्रमशः लड़खड़ाने के पश्चात्  दो पगों पर स्थिर हो कर खड़ा होना सीखा तो हर्षित हुआ ,पुनः पग भर कर जब चलना सीखा तो स्वयं सा अद्भुत शायद ही कोई और होगा ऐसा समझने लगा ।बस यहीं से उसकी जीवन यात्रा को तय करने की शुरुआत हो जाती है ।और फिर  इस राह पर चलते-चलते बहुत से ऊँचे -नीचे ,ऊबड़ -खाबड़ , संकरे ,पगडंडी भरे , सुहाने , मनोहर , घुटन भरे ,ऊमस भरे ,प्रकाश एवं अंधकार से भरे न जाने कौन-कौन से और भी कई रास्तों को पार करते -करते  फिर  वह ऐसे मोड़ पर पहुँच जाता है , जहाँ के बाद राह में इतनी  विभिन्नताएँ तो नहीं रहतीं  ,परन्तु जीवन के पड़ाव या ठहराव का एक ऐसा मोड़ आता है ,जहाँ पहुँच कर उसे लगने लगता है शायद अब गतिशीलता उतनी नहीं रही ।

यह जीवन में आने वाली वह अवस्था है जिसके बाद और कोई अवस्था अवतरित नहीं  होती । सोच कर देखा जाए तो वृद्धावस्था एक ऐसी ही अवस्था है , और यह जीवन का वह  सुनहरा अध्याय है जिससे पूर्व ऐसा कोई मोड़ या पड़ाव नहीं था ।एक ठहरे हुए बहाव की नदी के समान , जिसमें ऊपर से तो  शांति दृष्टिगोचर होती है परन्तु अंतर्मन की उथल -पुथल की लहरें पहले से कहीं अधिक तीव्र हो जाती हैं ।

यहाँ पहुँच कर अतीत के दृश्यों को पलटता हुआ मनुष्य अपने सम्पूर्ण जीवन का मूल्याँकन कर सकता है । पुनर्विचार करता हुआ कोमल भाव लताओं के  गुंफ़न में बहुत बार ऐसा उलझता है कि उनसे बाहर निकलने का कोई कोर या सिरा उसे नहीं मिल पाता है । परन्तु उसे यही बीता  हुआ कल अपनी सम्पत्ति के समान लगता है और इसी परिधि में चक्कर लगाता  हुआ वह अपना समय व्यतीत करने लगता है । अतीत के झरोखों से छन कर आती स्मृतियाँ उसे कभी प्रसन्न और कभी ग़मगीन कर जाती हैं , फिर भी वह उन्हें ही समेटना और बाँटना चाहता है ।

मनुष्य का पूरा जीवन सदैव किसी आशा के वशीभूत हो भविष्य के लिए कुछ सपने संजोये उनके पूरा होने की बाट जोहता रहता है । फिर अब इस पड़ाव पर पहुँच कर उसे लगता है कि अब सपनें क्या देखने ? क्योंकि अतीत में देखे गए सभी सपनों का पूर्ण विवरण और उनका परिणाम उसके समक्ष खुला पड़ा होता  है । परन्तु फिर भी सपने देखने का मोह ,मृत्यु पर्यन्त छोड़ नहीं पाता या उससे छूट नहीं पाता । ख़ैर 

सारांश रूप में यह समझ लेना चाहिए कि यह एक ऐसा पड़ाव है , जहाँ पर पहुँच कर और आगे कोई अवस्था आने वाली नहीं है । अतः जो भी समय है उसको आनंद और ख़ुशी के पल मान कर  उनका  भरपूर लुत्फ़ उठाना चाहिए ।लेकिन प्रायः देखने में जो सोच ,अक्सर सुनायी देती है कि अब बस न जाने कब उसकी इस दुनिया की यह पुस्तक समाप्त होगी और पुनः नए सिरे से नए जीवन का नया अध्याय आरम्भ होगा और उसे याद आने लगती हैं रहीम जी की कभी पढ़ी हुई ये पंक्तियाँ ———

“माली आवत देखि के,कलियन करे पुकारि ।

फूले-फूले चुनि लिये ,कालि हमारी बारि ।।”

रिश्ते

संसार में मानव -मानव के बीच का सम्बन्ध किसी रिश्ते को जन्म देता है । और रिश्ते भी कई प्रकार के हो सकते हैं । मुख्यतः यदि मानें तो एक रिश्ते वे हैं , जो भगवान द्वारा निर्मित हैं और दूसरे वे जो मनुष्य स्वयं अपने स्नेह और भावना से बनाता है । कई बार बनाए गए रिश्ते प्राकृतिक रिश्तों को भी मात दे देते हैं । पिछले दिनों एक समाचार पत्र में पढ़ा था कि एक व्यक्ति ने अपनी पाँच करोड़ की  सम्पत्ति   अपने नौकर के नाम कर दी । यह ऐसा ही है जो रिश्ता पूर्व निर्मित न हो कर रहते -रहते पनपा और इतना अधिक प्रगाढ़ हो गया ।

रिश्तों को निभाना भी एक कला है , और ये निभाने आने चाहिए । इनको निभाने में त्याग की भी आवश्यकता पड़ती है । और उस अवस्था में हिचकना नहीं चाहिए , स्वार्थपरता को धकेल कर त्याग की राह पर चलना चाहिए । रिश्ते मज़बूत और कमज़ोर बनाने में लेन- देन की भी एक भूमिका होती है , इसे बीच में न आने दें क्योंकि यदि लेन -देन मध्य में हो तो यह फिर व्यापार बन जाता है , रिश्ता नहीं रहता ,जबकि रिश्ते व्यापार नहीं परस्पर मेल – जोल का नाम है ।

भारतीय संस्कृति में रिश्तों के लिए फिर वही उदाहरणस्वरूप ,सुंदरता में बेजोड़ महाकाव्य है रामायण । जिसमें हर रिश्ते को बख़ूबी दर्शाया गया है । यदि देखा जाए तो रिश्ते निभाना – जोड़ना ऐसा जो कुछ भी है वह भारतीय संस्कृति में ही देखने को मिलता है , शेष अन्य किसी संस्कृति में ऐसी और इतनी सहनशीलता नहीं देखी जाती जो रिश्तों को निभाने में निरन्तरता ला सके ।

रिश्ते निभाने में सबसे मूल कड़ी है निःस्वार्थता , कहा भी गया है —-

“जो न दे दग़ा, वो ही है सगा ‘

जो रिश्ता स्वार्थ पर आधारित होता है उसकी उम्र छोटी होती है और उसका परिणाम वेदना -टीस या शत्रुता ही निकलता है । तो हमें यह सोचना चाहिए कि हम किसी भी रिश्ते में स्वार्थ की बू न आने दें , यदि ऐसा हो तो उसे टाल देना ही ठीक है ,क्योंकि भविष्य के लिए वह सही नहीं होगा । स्मरण रहे रिश्तों में मज़बूती लाने के लिए बहुत समय लग जाता है परन्तु नासमझी के कारण टूटने में एक पल का भी समय नहीं लगता । रिश्तों को सहेज -संभाल कर रख -रखाव से रखने की आवश्यकता होती है । ये रिश्ते काँच के समान पारदर्शी और चटकने वाले होते हैं अतः”handle with care ” सदैव ध्यान रखें । 

रिश्तों में खटास और मिठास को पैदा करने को लिए हुए बहुत सी बातें होती हैं । सबसे पहले तो आपस में अपनी वाणी पर भी नियंत्रण होना चाहिए क्योंकि वाणी से ही कोई दिल में उतर जाता है और वाणी से ही कोई दिल से उतर जाता है । अतः रिश्तों में मिठास लाएँ , त्यागभाव रखें , सहनशीलता अपनायें और जीवन को सुखी एवं आनन्दमय  बनाएँ तथा रिश्तों में जुड़ाव के लिए प्यार भरे स्नेह-सूत्र को आधार बनाएँ । यही बात बहुत पहले रहीम जी ने भी कही कि ——

रहिमन धागा प्रेम का , मत तोरो  चटकाय ।

टूटे पे फिर ना जुरे , जुरे गाँठ  परी जाए ।।

परस्पर व्यवहार में किसी को सुधारने की आवश्यकता नहीं है ,जो भी बदलाव या जैसा तुम दूसरों से चाहते हो वह स्वयं से ही शुरू कर दो काम आसान हो जाएगा । ।। इति ।।

तत्त्व -तथ्य

जीवन और मृत्यु जीवन के ऐसे दो ध्रुव अटल सत्य हैं ,जिनसे मुँह मोड़ना, नकारना , अस्वीकारना संभव नहीं ।ये ऐसे सार्वभौमिक , सार्वकालिक  सत्य -तथ्य हैं  जिसे  सभी जानते हैं परन्तु  विडम्बना यह है कि फिर भी हम अनजान नहीं अनचाहवान ज़रूर हैं । इन दोनों में से मानव केवल एक छोर  को पकड़े ही रहना चाहता है , दूसरे छोर की ओर ध्यान ही नहीं करता है ।

अरे ! ये बीतते पल, बढ़ते पग , तीव्रता से किस ओर जा रहे हैं ,उसी ओर उस छोर की ओर । और यदि हम  यह मान लें कि जीवन ही मृत्यु है और मृत्यु ही जीवन है तो जगत में कुछ भी अप्रत्याशित नहीं होगा । जो होगा वह यही  कि यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है और परिवर्तन क्रियाशील होते हुए भी स्थिर है । मृत्यु स्थल की ओर प्रतिपल बढ़ते हुए जीवन जी रहे हैं । नहीं ,इसे ऐसा सोचें कि हम पुनर्जन्म की ओर बढ़ रहे हैं , एक नवीन जीवन की ओर क्योंकि आत्मा को अमर कहा गया है तो फिर इसे समझने का प्रयास करते हैं  जैसे कि आत्मा – परमात्मा ये दो तत्त्व हैं , परन्तु आख़िर ये हैं  क्या ?जिन्हें समझ पाना सामान्य मानव जीवन में संभव नहीं ।

गीता ने कहा – आत्मा अमर है , यह बात एक साधारण व्यक्ति की समझ से बाहर है । यदि कोई  रूग्ण  है और उसे पूछें कि क्या हुआ ? तो वह कहता है ‘ मैं बीमार हूँ ‘ अर्थात् सोचा जाए तो यहाँ भी उसका मैं नहीं अपितु शरीर रोगी है । कोई गिरा तो बोला ‘ मैं गिर गया ‘ यहाँ भी शरीर गिरा , आहत  हुआ और चोट लगी ।

इतने पर भी लोग समझ नहीं पाते , किसी की मृत्यु पर होने वाला शोक अर्जुन की सोच का ही शोक  होता है । जब शरीर की सीमा रेखा पार कर उस  तथ्य को तत्त्व को समझ पायें तो यह शोक -मोह नहीं होगा ।

एक उदाहरण यदि  स्पष्ट करने के लिए लें कि रामलीला देखते हुए हमने देखा कि रावण मर गया ,परन्तु वास्तव में रावण रूप में अभिनेता रामलाल तो जीवित है । और जो मरा वह रंगमंच का पात्र रूप रावण मर गया । और फिर अभिनय के बाद वह तो सुरक्षित -स्वस्थ ही रहा ,वह तो रावण का अभिनय कर रहा था । 

इसी प्रकार विभिन्न स्थानों पर  विभिन्न नाम वाले पात्रों  ने रावण का किरदार निभाया और अभिनय के बाद में आगामी वर्ष में अभिनय करने के लिए पुनः तैयार हो गये । अब इस दृष्टान्त में पात्र रूप अभिनेता को थोड़ी देर समझने के लिए मान सकते हैं  कि वह आत्मा है और उसका खोल रावण रूपी अभिनेता ही मरा । वास्तविक यथार्थ और जो सत्य रूपी पात्र है वह तो जीवित है । समझने भर के लिए आत्मा की अमरता को समझा जा सकता है मात्र उदाहरण भर  के लिए । विशेष तत्त्व के लिए तो गहन  चिन्तन की आवश्यकता है । इस संसार रूपी रंगमंच पर अपना-अपना किरदार निभाने के लिए हम यहाँ क्रियाशील हैं। यही रामलाल एक ही अभिनेता कई पात्रों का अभिनय करता है कभी रावण , मेघनाथ —–आदि । पर वह एक है आत्मा की तरह । और इस प्रकार एक ही आत्मा अपना शरीर रूपी खोल छोड़ कर दूसरे खोल में नए अभिनेता के रूप में नवीन अभिनय के लिए चली जाती है 

एक उदाहरण वर्तमान में साधारण रूप से प्रयोग होने वाली घटना से भी स्पष्ट करने के लिए लिया जा सकता है जैसे कि सभी प्रायः जानते हैं  कि आपरेशन थिएटर में जब मरीज़ को बुलाया जाता है तो नाम लेकर कहा जाता है कि मरीज़ श्यामलाल को ले आओ , और यदि दुर्घटनावश आपरेशन थिएटर में उसकी मृत्यु हो जाती है तो कहते हैं  बॉडी ले जाओ । जो कि नाशवान है ,जब तक आत्मा भीतर था तो उसका नाम श्यामलाल था अब वह इसको छोड़ कर दूसरे स्थान पर प्रवेश कर गया और उसका नाम भी कोई दूसरा हो गया , अभिनेता पात्र के समान ही उसका किरदार बदल गया । बस इसी तरह से अमर आत्मा अपना शरीर , घर कुछ भी कह लीजिए बदलता रहता है और वह स्वयं निर्लिप्त ही रहता है ।

आत्मा की इसी यात्रा को गीता में इस प्रकार से कहा गया है ——–

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्नाति  नर : अपराणि ।

तथा  शरीराणि विहाय जीर्णानि  अन्यानि संयाति नवानि देही ।।

अर्थात् जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर दूसरे नए  वस्त्रों को ग्रहण करता है ,वैसे ही जीवात्मा पुराने  शरीरों को त्याग कर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त करता है ।।इति ।।

जीवन – जंग ?

प्रत्येक सांसारिक प्राणी सुखों की चाह में अपनी आहुति देकर भी जीना चाह रहा है या इसे यूँ समझें कि हम अपने भीतर किसी चाहत को पाल कर उसकी पूर्ति के लिए निरंतर संघर्षरत हैं । जीवन एक रणक्षेत्र है इसमें जूझना पड़ता है । यह बात बचपन में समझ नहीं आती , अथवा तब तक समझ नहीं आती जब तक हमें संसार के कुरुक्षेत्र की जंग में उतरना नहीं पड़ता ।

माता -पिता की सुरक्षित छांव में पलते हुए इस वाक्य का एहसास तो क्या अर्थ भी दूर-दूर तक समझ में नहीं आता । परन्तु जैसे-जैसे बालपन धुँधला होने लगता है , अपनी समझ-समझ पर हावी होने लगती है , तो कुछ -कुछ समझ आने लगता है कि ज़िंदगी जीना इतना आसान नहीं है । कुछ लोग ऐसा भी सोचने लगते हैंकि ज़िंदगी में ‘चाहत ‘का न कोई मूल्य है न कोई अर्थ ,क्योंकि तुम वैसी ही ज़िंदगी जीते हो जैसी तुम्हारे सामने आती है ,चाहो या ना चाहो ।

यदि विचार किया जाए तो ज़िंदगी के मायने सब के लिए कभी भी एक से नहीं हो सकते । जीवन के प्रति हमारा नज़रिया वही होगा जैसा हमें अनुभव होता है । एक अमीर और मज़दूर के लिए ज़िंदगी की परिभाषा एक समान कैसे हो सकती है ?

तो क्या ज़िंदगी जीने के ढंग पर निर्भर करती है ? शायद नहीं । इसमें सबसे प्रमुख है ‘मन ‘ कहा जाता है ना कि  ” मन यदि चंगा तो कठौती में गंगा ” इस आधार पर एक साधनहीन प्राणी भी सुखी जीवन जी सकता है  जबकि एक साधन सम्पन्न  भी दुखी जीवन जीता है ।

यह निर्भर करता है हमारे मन की सोच पर , जैसा कि गीता में मन को ही नियंत्रित करने की बात कही गयी है । जिसका मन विचलित नहीं है , स्थिर बुद्धि कहलाता है मन शांतचित्त होने पर सारे कुविचार शांत होकर सद्विचार उभरने लगते हैं । और यदि मन निर्विचार हो पाए तो असीम शांति का अनुभव हो सकता है ।

अब जीवन यदि जंग है तो जंग में क्या होता है ? इसमें होती है हार या जीत , तो फिर हमारी जीवन की सोच में हमें किससे जीतना है , हमें अपने मन को ही जीतना है क्योंकि —-

“मन के जीते जीत है मन के हारे हार ”

आइए ,मन को अपने वश में करें स्वयं को इसके वश में न होने दें । अपने मन के बॉस ख़ुद बनें उसे अपना सेवक बनायें जो तुम्हारे आदेश का पालन करे ,फिर जीवन  में जीत  का भरपूर आनंद उठाएँ , चहुँ ओर मंगल ही मंगल है ।। इति ।।

वातावरण -परिवेश -प्रभाव

किसी विदेशी विचारक का कथन है –“मनुष्य रोता हुआ पैदा होता है , दुखी हो कर जीवन जीता है और निराशा से मर जाता है ” ।

उस विचारक की सोच के मूल में ये ही निराशावादी भाव छाए रहे । चूँकि जिसने सोचा होगा कि जीवन की शुरुआत रोने से हुई तो उसका अंत भी दुखदायी माना जाए । लेकिन यह ज़रूरी नहीं ,क्योंकि वैसे जिस वातावरण और परिवेश में मानव बढ़ता ,फूलता, पनपता है उसी के अनुसार उसकी सोच बनना  अवश्यंभावी है , इसे कोई बदल नहीं सकता है ।

यदि सोचो तो समझने के लिए समझा जा सकता है ,कि  आज एक वृद्ध व्यक्ति ने अपने जन्म से लेकर तीस वर्ष तक की आयु किस वातावरण और परिवेश में बितायी है , तो उसका नज़रिया भी जीवन के प्रति उसी के आधार पर बन चुका है । और उसमें  उसे जो भी श्रेष्ठ व उत्तम लगा है ,अब वह उसी को जीवन में मान कर चलता है । अब वही व्यक्ति उस युवा को जीवन – मूल्य समझाता है जो कि उस वृद्ध से भिन्न , तीस वर्ष के भिन्न वातावरण में बढ़ा पला है । बस यहीं सोच का अंतर आ जाता है , और इस स्थिति में दोनों ही अपने-अपने स्थान पर विचारों की दृष्टि में सही होते है । क्योंकि दोनों की वैचारिक भिन्नता का आधार ही भिन्न – भिन्न है ।

फिर इससे आगे की आने वाली पीढ़ी के लिए और भी  भिन्न वातावरण और परिवेश होगा और उसमें रह कर पल कर बढ़ी होने वाली पीढ़ी का अंतर उस वृद्ध से और भी अधिक बढ़ जाएगा ।

वातावरण से सोच और सोच के बाद भावनाएँ बदल जाती हैं । अतीत काल की भावुकता का स्थान आज व्यावहारिकता ने ले लिया है । इत्र की सुगन्ध का स्थान पर्फ़्यूम सप्रे ने ले लिया है । धीरे -धीरे सरकने वाली ज़िन्दगी का स्थान आज दौड़ धूप ने ले लिया है । आज कोई किसी प्रकार का बन्धन अपनाने को तैयार नहीं है ।

बन्धन से याद आया कि अतीत में विवाह का एक बन्धन था , और वह बन्धन मृत्यु -पर्यन्त अटूट भी था । परन्तु आज उसकी अहमियत कितनी है ? उसी अटूट बन्धन से बँधे दम्पत्ति का एक परिवार बनता था , और उसमें भी सभी एक दूसरे के स्नेह – बन्धन से जुड़े रहते थे । जीवन बहुत कठोर -कठिन नहीं लगता था , चूँकि सुख -दुःख मिलकर बाँट कर जिए जाते थे । परंतु आज के युग में आज की पीढ़ी बन्धन में बँधने से ही दूर भाग जाना चाहती है , इसमें उसका दम घुटता है । जबकि पुरानी पीढ़ी इसी  बन्धन की कस्तूरी – गंध को अपने भीतर लिए पूरा जीवन जी जाती थी ।

भारतीय संस्कृति के मूल महाकाव्य रामायण में वर्णित संस्कृति आज भी जीवित है पूरी तरह से समाप्त नहीं हुई है । क्योंकि चाहे कितना भी वातावरण परिवर्तित हो गया हो परन्तु आज भी संयुक्त परिवार, परस्पर भाई – भाई , माता – पिता , गुरु – शिष्य परम्परा में तत्कालीन आपसी स्नेह , सम्मान , त्याग देखने को मिलता है । भारत में आज भी माता -पिता , बड़े बुज़ुर्गों के प्रति सम्मान , सेवा, श्रद्धा का भाव और छोटों के प्रति स्नेह ,प्यार,दुलार दिखायी देता है ,जो कि अन्यत्र नहीं ।

सदैव स्मरण रखें , सभ्यता और संस्कृति एक वृक्ष के समान है ,जिसका मूल या जड़ है संस्कृति ,जो संस्कारों से निर्मित होती है । यदि वृक्ष का मूल या जड़ें हिल जायें तो उसे सूखने और समाप्त होने से कोई नहीं रोक सकता । यदि किसी वर्ग – जाति की संस्कृति मिट जाती है तो वह जाति दुनिया से मिट जाती है ।

कहीं ऐसा न हो कि जिस नवीनता को हम विकास मान रहे हैं ,वही चक्रव्यूह आगामी कल में हमारे  विनाश का परिणाम बने ।वक़्त बहुत बड़ा अस्त्र होता है । जीवन के परिवर्तन में हम सब इसी के पराधीन हुए उतरते – डूबते रहते हैं ।आज जो असंभव दीखता है कल वही समय परिवर्तन होने पर सम्भव हो जाता है ।

निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि इतिहास के पन्ने हमारे पास हैं । इतिहास अच्छा – बुरा दोनों प्रकार का होता है । इतिहास से सबक़ लेने में समझदारी है ,यदि इतिहास को अनदेखा किया जाए तो इतिहास स्वयं अपने को दोहराता है ।।इति ।।

तलाश

मानव ने जन्म लिया, संसार में आगमन हुआ , होश सम्भाला तो ज्ञात हुआ यह जीवन है । इस को जीने के लिए , बेहतर ढंग से जीने के लिए , जिया जाए  कैसे ?इसी प्रयास में , उधेड़ – बुन की सोच में , वक़्त बीतने लगता है । हालात  के वशीभूत हुआ इंसान  उन्हीं  रास्तों में से अपने लिए जीने का रास्ता चुनने  लगता है । और रास्ता चुनने के बाद चलने पर पता  चलता है कि रास्ता तो ग़लत चुन लिया या सही चुन लिया ।

पथ या राह चुनने  की प्रक्रिया में जो उत्तम या सर्वश्रेष्ठ लगता है उसे ही चुना जाता है , बेशक उसमें बाधाएँ हीं क्यों न हों । और फिर कभी फल सोच के अनुसार होता है और कभी कुछ भी नहीं और कभी एकदम विपरीत होता है ।

जीवन की व्यस्तता और आपाधापी में बहुत कुछ अनदेखा कर दिया जाता है । बचपन  का तो कुछ पता ही नहीं चलता , वह कैसे बीत जाता है । और पूरा जीवन उन स्मृतियों को हमारा मन अपने भीतर संजोये रहता है । फिर युवा होते – होते जो समझ पैदा हो जाती है , क्रियाशीलता – कार्यक्षमता बढ़ने के साथ – साथ व्यस्तता भी बढ़ने लगती है ।और यह जीवन की अवस्था कैसे बेहोशी में कार्य करते – करते बेदम होकर  अधेड़ – वृद्धावस्था के सोपान तक पहुँच जाती है । अब इस अवस्था में यह निर्भर करता है कि युवावस्था कैसे बीती है ? आराम से सिल्वर – स्पून के सहारे या संघर्ष करते – करते जिसमें समय का पता ही नहीं चला । अब ऐसी अवस्था को बिता कर अधेड़ या वृद्ध होने वाला व्यक्ति उतना उमंगित और सक्रिय चाह कर भी नहीं हो  पाता या रह पाता । 

क्योंकि अतीत में स्वयं  ही किया गया  स्वशक्ति का अतिक्रमण उसे भीतर से और बाहर से यानि शारीरिक एवं मानसिक रूप से तोड़ चुका होता है । उसे पुनः स्पंदित करने के लिए एक सहारे की तलाश होती है , जो भावनाओं को सहला सके , उसे शक्ति दे  सके । यदि उसे यह सहारा मिल जाता है तो भावनात्मक रूप से मज़बूत होने के बाद , उसकी शारीरिक शक्तियाँ संचित हो कर  पुनः संचारित होने लगती हैं। और वह फिर से जीवन  की मेराथन दौड़ में जीत हासिल करने का  सपना देखने लगता है । परन्तु इसके विपरीत यदि उन चरमराते हुए भावों को सहारा न मिले तो उसका खड़ा होना भी मुश्किल हो जाता है । मगर उस समय सर्वाधिक सहायक जो कोई भी बने , वही उसका सर्वप्रिय बन जाता है ।

इस  समय उसकी सबसे बड़ी तलाश – आस में उसे अपनों में अपनी संतान की होती है , वह उसी की बाट जोहता है । क्योंकि पल – पल आज तक उनके अरमानों को बुनते- बुनते बढ़ा – बूढ़ा हुआ है । यदि उनकी ओर से उपेक्षा हो तो यह बात उसे पूरी तरह से धराशायी कर देती है ।

परन्तु ये तो जीवन की अवस्थाएँ हैं , सभी के जीवन में आती हैं । वक़्त बढ़ता रहता है , चलता रहता है । कुछ समय से पहले संभल कर वक़्त के तक़ाज़े और अन्दाज़ को समझ कर संभल जाते हैं । और कुछ हालात में पड़ कर पछताते हैं ।

कहीं ऐसा न हो कि मनचाही तलाश , कहीं आस की टकटकी लगाई हुई आँखों को नज़रंदाज कर दे  । इसलिए बेहतर है कि अपेक्षाओं को भूल कर या उनकी उपेक्षा कर चैन की बाँसुरी बजा कर , मंत्र मुग्ध हो कर , आनंदित रहें । ।इति ।।

मोह और प्रेम

मनुष्य अपना सम्पूर्ण जीवन इन्हीं  द्व्ंद्वों के जाल के जंजाल में फँसा – उलझा  हुआ काट देता है । परन्तु क्या मोह और प्रेम एक ही भाव है अथवा इनमें  कोई भेद या अंतर है । ऊपरी तौर पर लगता है कि यह तो लगाव या आसक्ति है जिसे दो शब्द दे दिए गये हैं । नहीं यह ऐसा नहीं है  , यदि कुछ समझने का  प्रयास किया जाए तो एक शब्द किसी के लिए अथवा हम कहें  कि अच्छे अर्थ में है और दूसरा अर्थ जिसका दूरगामी परिणाम भयावह भी हो सकता है । 

यदि समझने की कोशिश करें तो जहाँ मोह में स्वार्थपरता है वहाँ प्रेम में त्याग की भावना है । अगर प्रेम में त्याग नहीं है तो वह  प्रेम भी नहीं है । जिस प्रकार हम प्रेम से ओत – प्रोत होते हैं तो देने का भाव , बाँटने का भाव उभरता है । प्रेम रसमय है और इसको जितना वितरित करते चलो यह उतना ही आनंद प्रदान करता है । प्रेम को आधार बना कर ही पूरे विश्व को परिवार बनाया जा सकता है । क्योंकि प्रेम असीम है और इसका दायरा सीमारहित है । प्रेम से आप किसी को भी अपना सखा – सगा बना सकते हैं ।

परन्तु मोह सर्वथा इसके विपरीत है , उसमें उदारता नहीं सीमितता है , उसका  दायरा संकुचित है इतना संकुचित कि स्वयं के साथ-साथ दूसरे को भी घुटन से भर दे ।

“अतः बाँटना प्रेम -प्रसाद है बटोरना  दुःख – विषाद है ”

यदि  विचार करें तो बहुधा परिवारों में होने वाले दुराव – अलगाव में यह मोह भी अपनी कटु भूमिका निभाता है । सामाजिक रीति परम्परा के अनुसार माता- पिता अपने बेटा – बेटी का विवाह तो कर देते हैं । परंतु मोहवश उन्हें उनके प्रेम से फलता  फूलता नहीं देख पाते । ऐसा समझते हैं कि जैसे हमारी कोई वस्तु थी जो हमसे छिन गयी ,जबकि ऐसा सोचना सर्वथा व्यर्थ है । यदि  आप उनसे प्रेम करते हैं तो आपको उनकी ख़ुशी में और भी अधिक ख़ुशी मिलनी चाहिए । पर नहीं ,ऐसा प्रायः कर  नहीं पाते या ऐसा होता सह नहीं पाते । परिवारों में होने वाली दुर्घटनाओं को यदि खंगाला जाए तो यह मोह ही है जो इतना वीभत्स रूप ले लेता है ।

कहने का अभिप्राय यह है कि हमें मोह का दामन छोड़ प्रेम को अपनाना चाहिए । यही जीने का ,आनंद का और सुख का आधार है क्योंकि —–

पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ ,पंडित भया न कोय ।

ढाई आखर प्रेम का , पढ़े सो पंडित  होय ।। इति ।।

 

एक सोच

मनुष्य जीवन  में आने वाली परिस्थितियों के आधीन है और उसे उनका सामना निश्चित रूप से करना पड़ता है । जबकि कुछ तो डट कर परिस्थितियों का सामना करते हैं । पर ऐसे सूरमा विरले ही होते हैं । तो फिर क्या करें ? विचारपूर्वक या तो पूरी ताक़त लगा कर परिस्थितियों को बदल दें अगर नहीं बदल सकते तो ख़ुद को बदल लें । 

मान लीजिए ऐसा होता है कि एकाएक कभी कोई क्रोध के आवेश में आपसे ऐसी विस्फोटक उक्तियाँ कह डालता है , जिन्हें सह पाना आपके लिए तो बस बिलकुल सम्भव ही नहीं , पर तनिक रुक कर सोचिए कि परिस्थितिवश क्षणिक आवेश में तुरंत हुई प्रतिक्रियास्वरूप , कहे कथन का औचित्य क्या ? उसे अन्यथा न लेना चाहिए । 

विधाता ने जितना और जैसा जीवन लिख दिया उसे वैसा ही स्वीकारने में सुख , विपरीतावस्थानुभव  में दुःख होगा । परिस्थितियों के चलते कभी मनुष्य समय-वक़्त की उस सीमा पर पहुँच जाता है  जब उसे लगता है कि उसे किसी की सहानुभूति या हमदर्दी की आवश्यकता नहीं , परन्तु समय चक्र है जो परिवर्तित होता रहता है उसे समझ लेना विवेक है और न समझना अविवेक है ।

परिश्रम और परिश्रम सतत करते रहने पर भी उद्देश्य या फलप्राप्ति न हो पाने की स्थिति में अवशिष्ट है विवशता , चूँकि  यदि ऐसा न होता तो हम निश्चय ही सदैव विजयी होते । अपने को अपने आप से सांत्वना देने हेतु विफलता को नियति मान लेना समीचीन न होगा । मानव , मन से नियंत्रित रहने पर केवल मृगतृष्णा  ही पा सकता है । यदि सम्पूर्ण शांतभाव  को पाना हो तो मस्तिष्क की सोच उपयोगी सिद्ध हो सकती है ।

कोई किसी के लिए न तो जीता है  और न मरता है , ऐसी सोच एक सत्य है । इससे विपरीत सोचना केवल भ्रम है और दिग्भ्रमित होने अथवा करने का एक छलावा है । इस जीवन के रहते ही इस भ्रम और ख़ुशफ़हमी को बाहर निकाल फेंकना चाहिए कि इस दुनिया में मेरे बाद बहुत बड़ा नुक़सान हो जाएगा । ऐसा कुछ नहीं होगा । सभी इस परिवर्तनशील  जगत में अपने – अपने हिस्से का सुख या दुःख भोगने के लिए आते हैं और परिस्थितिवश रिश्तों के मायाजाल में फँस कर मोहग्रस्त हो जाते हैं । 

हमारी अनुभूतियाँ अपनी हैं और उन्हें विभाजित नहीं किया जा सकता । कोई  सह – अनुभूति करता है यह भी एक क्षणिक सुकून है , जो स्थायी है वह केवल  वेदना  टीस और पीड़ा है । जो किसी भी मौक़े बेमौके अथवा क्षण में छाया के समान हमारा पीछा नहीं छोड़ती है । यदि उससे व्यतीत – अतीत से मुक्ति का उपाय खोजना चाहें तो सरल अर्थ में है अपने मन – मस्तिष्क को नियंत्रित रखो, और उस पर ऐसा कोई भाव हावी न होने दो । सदैव स्मरण रहे —–

“गुज़रता हुआ वर्तमान का हर पल अतीत के गर्त में गुम होता जाता है ” ।। इति ।।

परिवार

परिवार समाज की एक इकाई है और इसी का वृहद रूप समाज – राष्ट्र – विश्व का रूप ले लेता है । परिवार शब्द अपने आप में कितना सुखद एहसास समेटे हुए है । इस का अनुभव सुखी परिवार में रहने वाला ही कर सकता है । 

एक परिवार में एकजुट होकर रहना ही समझिए कितना बड़ा सुख है । परंतु इस सुख से वंचित इसकी पीड़ा को वे ही समझ सकते हैं जिन्हें परिवार नसीब नहीं हुआ ऐसा होने पर वे स्वयं को अनाथ ही समझते हैं ।

यदि आज के पर्यावरण में एकल परिवारों के बारे में सोचा जाए तो परिवार के सदस्यों की संख्या तो है परन्तु एक परिवार के प्रत्येक सदस्य का अपना ही एक अलग जीवन है । अतीत के परिवारों का दर्शन आधुनिक परिवारों में कहाँ है ? प्राचीन परम्परा  में संयुक्त परिवारों का चलन था , जहाँ सभी मिलजुल कर सहयोग समूह के रूप में रहते थे । उस समय के दुःख – सुख मिल बाँट कर भोगे जाते थे , और समय का पता ही नहीं चलता था। परन्तु अब दायरा सिमट चुका है। घर चलाने वाले दोनों सदस्य अपनी – अपनी। आजीविका पर निकल जाते हैं , और बच्चों का निर्माण या तो टी .वी करता है या आया । आया भी आयी और गयी है । मूल रूप से देखा जाए तो विज्ञान की उन्नति भी पारिवारिक बिखराव का कारण किसी न किसी  रूप में है । विज्ञान ने हमें सुख सुविधाओं  के साधन दिए हैं । जो केवल  हमारे शरीर की आवश्यकताओं को ही पूरा कर पाते हैं परन्तु वे हमारे मन तक नहीं पहुँच पाते ।

जीवन में इतनी भागमभाग है कि फ़ुर्सत ही नहीं कि मिल बैठ कर अपनी कहें और किसी की सुनें । इसके स्थान पर बेहतर मानते हैं  ऑन लाइन मेल कर देना या फ़ोन कर लेना । भला क्या इन उपकरणो – साधनों से हमारा मनोभाव दूसरों तक पहुँचता है? नहीं , इसी क्रम से धीरे – धीरे रिश्तों में भावनाशून्यता आ जाती है । भावनाशून्य होने पर मनुष्य – मनुष्य नहीं रह पाता । क्रमशः होने वाला यह अभाव हमें पशुता की ओर ले जाता है।

तो इसके लिए किया क्या जाना चाहिए ? तो थोड़ा विचार कर सोचना चाहिए कि इस मस्तिष्क की मेमरी में हमने जो बातें या आइटम भर रखें हैं , क्या वे सभी ज़रूरी हैं ? यदि नहीं तो उन्हें खंगाल कर डिलीट कर के कुछ ख़ाली स्थान बनाना चाहिए । जिससे हम किसी को अपनी कह सकें और दूसरे की सुन सकें । 

क्योंकि  तुलनात्मक रूप से ही हम किसी निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं । जैसे सबसे पहले तो परिवार में मिलने का समय निकालना चाहिए । दिन में तो सभी व्यस्त रहते  हैं । ऐसा करने का प्रयत्न करें कि रात्रि का भोजन इकट्ठा मिल कर किया जाना चाहिए । यदि सम्भव नहीं तो टाइम टेबल में ऐसा निश्चित  करें कि प्रतिदिन एक घंटा सभी मिल कर बैठें , अपनी दिनचर्या पर चर्चा करें , कोई समस्या हो तो उस पर परिचर्चा  करें । बहुत बार समाधान भी निकल आता है । अगर ऐसा कोई भी मिलने का बिंदु इसके अतिरिक्त भी हो सकता है तो सोचना चाहिए । नहीं तो फिर यही होगा सब अपनी – अपनी डफ़ली अपना – अपना  राग । परिवार के प्रत्येक सदस्य को इस बारे में सोचना चाहिए कि हम सब एक हैं और हमारी एकता में ही बल और बरकत है , विपरीत इसके जीवन ढोने के बराबर है । ज़िंदगी में मज़ा लेने वाली कोई बात नहीं । 

इन सब में एक सबसे बढ़ा फ़ैक्टर है प्रेम । अतः प्रेम से रहें , और दूसरी बात एक दूसरे के गुणों पर ध्यान दें बुराइयों को नज़रंदाज करें परन्तु समझायें अवश्य ताकि ग़लत पथ पर जाने से बच जाए । तो फिर — 

प्रेम है जहाँ ख़ुशहाली है वहाँ   ,    तो प्यार बाँटते चलो ।।इति ।।