सागर

सागर के अंतर की थाह किसने पायी है ?

कहने को तो ये दुनिया 

नाप ली हमने , 

जो विधाता ने बनायी है ।

सागर की सीमा नहीं कोई ,

इतना विशाल कि पता नहीं 

इसका कोई ओर – छोर ।

लगता है भाव भरे  हैं इसके अंतस्तल में ,

तभी तो गर्जना और 

हुंकार सुनायी देती है ।

अम्बर समेट कर इसकी  पीर की उष्णता

अपने अंतर में ———–

लौटा देता है शीतल कर 

बरसा वापस उसी में ।

सागर सा दरिया दिल ,

कौन होगा ?

जिसमें प्रलय नहीं आती 

अगर आ जाती ,

तो यह सृष्टि न रह पाती ।

सागर है अथाह 

नहीं पा सकते इसकी थाह ,

हृदय टटोलो अपना तो 

शायद पता चले कि ,

इसके अंतर में क्या भरा है 

थाह – आह – या कोई  चाह   ?

इति 

 

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