सहमति – समझौता

जीवन किस से चलता है ? कैसे चलता है ? वैसे तो जीवन को सुगम बनाने के लिए बाधाओं , रुकावटों , समस्याओं के समाधान के लिए बहुत सी कड़ियों का सहारा लेना पड़ता है । उन कड़ियों में यदि सोचा जाए तो शायद सहमति और समझौता दोनों ही इस यात्रा को चलाने में मददगार होते हैं । 

मनुष्य यदि यह सोचने लगे कि मैं तो केवल सहमति से ही चलूँगा या गी तो सम्भव नहीं , क्योंकि ऐसा निश्चय करने पर आपको अपना बहुत कुछ खोना – तोड़ना पड़ेगा , बहुत सम्भव है जो आपका मत है उस पर सहमति न बन पाए तो ऐसी अवस्था में या तो आप अलग हो जायें अगर नहीं , तो तब स्थिति आती है समझौते की । इन दोनों को स्वीकार करने में अंतर है ।

जहाँ सहमति एक अंतर्मन की प्रसन्नता है , वहीं पर समझौता है ,जो उस स्थिति को सम्भालने का एक प्रयास या योगदान  है । और मनुष्य भीतर से पूर्ण प्रसन्न नहीं होता या ऐसा कहें की लाचारी का नाम भी समझौता हो सकता है ।  प्रश्न है कि दोनों में से किसे अपनाया जाए ? वैसे प्रायः ‘ समझौता करने वाला  नहीं करवाने वाला प्रसन्न होता है । ‘

यदि गम्भीरता से सोचें तो ये दोनों शब्द कार्य को आगे बढ़ाने की कड़ी हैं । जहाँ सहमति न बन पाए वहाँ समझौता कर कार्य को पूर्णता की ओर सरकाना चाहिए । और अपने मन को तार्किक ढंग से समझाने के अन्य रास्ते सुझा लेने चाहिए । क्योंकि यदि समझौता न कर पायें तो संसार में जीवन यात्रा चला पाना सम्भव न हो पाएगा । क्योंकि  बहुत बार हमें अपने निहित स्वार्थों  को छोड़ कर दूसरों के लिए त्याग करने में ही संतोष प्राप्त करना चाहिए । विद्वानों ने संतोष को ही सबसे बड़ा धन कहा है । अत :  संतोष – सब्र का दामन थाम कर  प्रसन्न और प्रफुल्लित रहें और मन में विचार रखें कि ——

साईं इतना दीजिए जामें कुटुंब समाय ।

मैं भी भूखा ना रहूँ  साधू न  भूखा जाए ।। इति ।। 

 

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