सम्बन्ध

परिवार मानव निर्मित इकाई नहीं है । उसे उस परम पिता परमात्मा ने रचा है ।कौन -कौन उसके सदस्य बनने हैं , उन सबका चुनने या बनाने वाला ईश्वर है । मनुष्य का तो यह कर्तव्य बनता है कि वह उस विधाता की इस देन को  सहेज कर रखे । उसने जो रिश्ता बनाया है और जिस रिश्ते में बांधा है उस रिश्ते का मान रखें । रिश्ते निभाने की चीज़ है , रिश्ते निभाने चाहिए और उनका आधार प्रेम के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है ।

माता पिता और बच्चे यह परिवार का सर्वप्रथम मूल अंश है ,इसको संगठित कर एक मज़बूत रूप देना चाहिए । प्रत्येक सदस्य को सोचना चाहिए कि हमें भगवान ने जोड़ा है अतः हमें जुड़ के ही रहना है  । हमारे सभी कार्य इसी दिशा में होने चाहिए , सदैव ध्यान रखना चाहिए कि मतभेद बेशक हो जाएँ मनभेद न हों । बड़े छोटों को आशीर्वाद – दुआएँ देते रहें और छोटे बड़ों  का सम्मान करें , साथ ही साथ सहनशील बनें । क्योंकि यह मान कर चलें कि यह परिवार ही है ,जिसमें बिना स्वार्थ के प्यार मिलता है । इससे बाहर जो भी रिश्ते हैं सब में स्वार्थ घुला-मिला रहता है । परिवार में चाहे कितनी भी लड़ाईं हो जाए ऊँच-नीच हो जाए परंतु दिलों में प्यार कम होने सम्भावना शून्य रहती है । बच्चे माँ बाप को कई बार कटुता से बोल देते हैं , परन्तु माँ बाप के हृदय में उनके प्रति कभी कड़वाहट नहीं आती । क्योंकि यह प्राकृतिक है कि वे सदैव उन पर अपनी ममता ही लुटाते है । यही उनका स्वभाव है , स्वभाव को बदला नहीं जा सकता देखिये ——-

“बादल समुद्र का खारा पानी लेकर भी वर्षा के रूप में मीठा पानी ही बरसाता है ।”

“साँप मधुर दूध पी कर भी विष उगलता है ”

परिवार के प्रत्येक सदस्य को हमेशा यह सोचना चाहिए कि मैं अन्य सदस्यों के लिए और क्या कर सकता हूँ । परिवार में प्रेम प्यार का होना बहुत ज़रूरी है । जहाँ पर प्रेम होता है वहीं पर लक्ष्मी और ख़ुशियाँ भी स्थायी रूप से रहने लगती हैं । इसके अभाव में घर-घर नहीं रहता है , नित्य क्लेश के कारण सब कुछ समाप्त हो जाता है बरकत नहीं रहती ।सांसारिक  सम्बन्धों का  नियम है  पारस्परिक आदान – प्रदान । कहा जाता है कि जो पाना चाहते हो उसे ही देना आरम्भ कर दो वह स्वतः ही तुम्हारे पास आ जाएगा यथा  प्यार ,पैसा ,वस्त्र,नफ़रत,आनंद ,सुख -दुःख,कुछ भी  जो चाहिए देना शुरू कर  दो ।

निष्कर्ष यही है कि परिवार का आधार प्यार है इसको फैलाने और बनाए रखने के लिए सतत प्रयत्नशील रहें ,सहनशीलता अपनाएँ ,सन्मार्गी बनें और बनाएँ जिससे परिवार में ख़ुशियाँ लहलहायें  ।।इति ।।

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