वातावरण -परिवेश -प्रभाव

किसी विदेशी विचारक का कथन है –“मनुष्य रोता हुआ पैदा होता है , दुखी हो कर जीवन जीता है और निराशा से मर जाता है ” ।

उस विचारक की सोच के मूल में ये ही निराशावादी भाव छाए रहे । चूँकि जिसने सोचा होगा कि जीवन की शुरुआत रोने से हुई तो उसका अंत भी दुखदायी माना जाए । लेकिन यह ज़रूरी नहीं ,क्योंकि वैसे जिस वातावरण और परिवेश में मानव बढ़ता ,फूलता, पनपता है उसी के अनुसार उसकी सोच बनना  अवश्यंभावी है , इसे कोई बदल नहीं सकता है ।

यदि सोचो तो समझने के लिए समझा जा सकता है ,कि  आज एक वृद्ध व्यक्ति ने अपने जन्म से लेकर तीस वर्ष तक की आयु किस वातावरण और परिवेश में बितायी है , तो उसका नज़रिया भी जीवन के प्रति उसी के आधार पर बन चुका है । और उसमें  उसे जो भी श्रेष्ठ व उत्तम लगा है ,अब वह उसी को जीवन में मान कर चलता है । अब वही व्यक्ति उस युवा को जीवन – मूल्य समझाता है जो कि उस वृद्ध से भिन्न , तीस वर्ष के भिन्न वातावरण में बढ़ा पला है । बस यहीं सोच का अंतर आ जाता है , और इस स्थिति में दोनों ही अपने-अपने स्थान पर विचारों की दृष्टि में सही होते है । क्योंकि दोनों की वैचारिक भिन्नता का आधार ही भिन्न – भिन्न है ।

फिर इससे आगे की आने वाली पीढ़ी के लिए और भी  भिन्न वातावरण और परिवेश होगा और उसमें रह कर पल कर बढ़ी होने वाली पीढ़ी का अंतर उस वृद्ध से और भी अधिक बढ़ जाएगा ।

वातावरण से सोच और सोच के बाद भावनाएँ बदल जाती हैं । अतीत काल की भावुकता का स्थान आज व्यावहारिकता ने ले लिया है । इत्र की सुगन्ध का स्थान पर्फ़्यूम सप्रे ने ले लिया है । धीरे -धीरे सरकने वाली ज़िन्दगी का स्थान आज दौड़ धूप ने ले लिया है । आज कोई किसी प्रकार का बन्धन अपनाने को तैयार नहीं है ।

बन्धन से याद आया कि अतीत में विवाह का एक बन्धन था , और वह बन्धन मृत्यु -पर्यन्त अटूट भी था । परन्तु आज उसकी अहमियत कितनी है ? उसी अटूट बन्धन से बँधे दम्पत्ति का एक परिवार बनता था , और उसमें भी सभी एक दूसरे के स्नेह – बन्धन से जुड़े रहते थे । जीवन बहुत कठोर -कठिन नहीं लगता था , चूँकि सुख -दुःख मिलकर बाँट कर जिए जाते थे । परंतु आज के युग में आज की पीढ़ी बन्धन में बँधने से ही दूर भाग जाना चाहती है , इसमें उसका दम घुटता है । जबकि पुरानी पीढ़ी इसी  बन्धन की कस्तूरी – गंध को अपने भीतर लिए पूरा जीवन जी जाती थी ।

भारतीय संस्कृति के मूल महाकाव्य रामायण में वर्णित संस्कृति आज भी जीवित है पूरी तरह से समाप्त नहीं हुई है । क्योंकि चाहे कितना भी वातावरण परिवर्तित हो गया हो परन्तु आज भी संयुक्त परिवार, परस्पर भाई – भाई , माता – पिता , गुरु – शिष्य परम्परा में तत्कालीन आपसी स्नेह , सम्मान , त्याग देखने को मिलता है । भारत में आज भी माता -पिता , बड़े बुज़ुर्गों के प्रति सम्मान , सेवा, श्रद्धा का भाव और छोटों के प्रति स्नेह ,प्यार,दुलार दिखायी देता है ,जो कि अन्यत्र नहीं ।

सदैव स्मरण रखें , सभ्यता और संस्कृति एक वृक्ष के समान है ,जिसका मूल या जड़ है संस्कृति ,जो संस्कारों से निर्मित होती है । यदि वृक्ष का मूल या जड़ें हिल जायें तो उसे सूखने और समाप्त होने से कोई नहीं रोक सकता । यदि किसी वर्ग – जाति की संस्कृति मिट जाती है तो वह जाति दुनिया से मिट जाती है ।

कहीं ऐसा न हो कि जिस नवीनता को हम विकास मान रहे हैं ,वही चक्रव्यूह आगामी कल में हमारे  विनाश का परिणाम बने ।वक़्त बहुत बड़ा अस्त्र होता है । जीवन के परिवर्तन में हम सब इसी के पराधीन हुए उतरते – डूबते रहते हैं ।आज जो असंभव दीखता है कल वही समय परिवर्तन होने पर सम्भव हो जाता है ।

निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि इतिहास के पन्ने हमारे पास हैं । इतिहास अच्छा – बुरा दोनों प्रकार का होता है । इतिहास से सबक़ लेने में समझदारी है ,यदि इतिहास को अनदेखा किया जाए तो इतिहास स्वयं अपने को दोहराता है ।।इति ।।

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