रिश्ते

संसार में मानव -मानव के बीच का सम्बन्ध किसी रिश्ते को जन्म देता है । और रिश्ते भी कई प्रकार के हो सकते हैं । मुख्यतः यदि मानें तो एक रिश्ते वे हैं , जो भगवान द्वारा निर्मित हैं और दूसरे वे जो मनुष्य स्वयं अपने स्नेह और भावना से बनाता है । कई बार बनाए गए रिश्ते प्राकृतिक रिश्तों को भी मात दे देते हैं । पिछले दिनों एक समाचार पत्र में पढ़ा था कि एक व्यक्ति ने अपनी पाँच करोड़ की  सम्पत्ति   अपने नौकर के नाम कर दी । यह ऐसा ही है जो रिश्ता पूर्व निर्मित न हो कर रहते -रहते पनपा और इतना अधिक प्रगाढ़ हो गया ।

रिश्तों को निभाना भी एक कला है , और ये निभाने आने चाहिए । इनको निभाने में त्याग की भी आवश्यकता पड़ती है । और उस अवस्था में हिचकना नहीं चाहिए , स्वार्थपरता को धकेल कर त्याग की राह पर चलना चाहिए । रिश्ते मज़बूत और कमज़ोर बनाने में लेन- देन की भी एक भूमिका होती है , इसे बीच में न आने दें क्योंकि यदि लेन -देन मध्य में हो तो यह फिर व्यापार बन जाता है , रिश्ता नहीं रहता ,जबकि रिश्ते व्यापार नहीं परस्पर मेल – जोल का नाम है ।

भारतीय संस्कृति में रिश्तों के लिए फिर वही उदाहरणस्वरूप ,सुंदरता में बेजोड़ महाकाव्य है रामायण । जिसमें हर रिश्ते को बख़ूबी दर्शाया गया है । यदि देखा जाए तो रिश्ते निभाना – जोड़ना ऐसा जो कुछ भी है वह भारतीय संस्कृति में ही देखने को मिलता है , शेष अन्य किसी संस्कृति में ऐसी और इतनी सहनशीलता नहीं देखी जाती जो रिश्तों को निभाने में निरन्तरता ला सके ।

रिश्ते निभाने में सबसे मूल कड़ी है निःस्वार्थता , कहा भी गया है —-

“जो न दे दग़ा, वो ही है सगा ‘

जो रिश्ता स्वार्थ पर आधारित होता है उसकी उम्र छोटी होती है और उसका परिणाम वेदना -टीस या शत्रुता ही निकलता है । तो हमें यह सोचना चाहिए कि हम किसी भी रिश्ते में स्वार्थ की बू न आने दें , यदि ऐसा हो तो उसे टाल देना ही ठीक है ,क्योंकि भविष्य के लिए वह सही नहीं होगा । स्मरण रहे रिश्तों में मज़बूती लाने के लिए बहुत समय लग जाता है परन्तु नासमझी के कारण टूटने में एक पल का भी समय नहीं लगता । रिश्तों को सहेज -संभाल कर रख -रखाव से रखने की आवश्यकता होती है । ये रिश्ते काँच के समान पारदर्शी और चटकने वाले होते हैं अतः”handle with care ” सदैव ध्यान रखें । 

रिश्तों में खटास और मिठास को पैदा करने को लिए हुए बहुत सी बातें होती हैं । सबसे पहले तो आपस में अपनी वाणी पर भी नियंत्रण होना चाहिए क्योंकि वाणी से ही कोई दिल में उतर जाता है और वाणी से ही कोई दिल से उतर जाता है । अतः रिश्तों में मिठास लाएँ , त्यागभाव रखें , सहनशीलता अपनायें और जीवन को सुखी एवं आनन्दमय  बनाएँ तथा रिश्तों में जुड़ाव के लिए प्यार भरे स्नेह-सूत्र को आधार बनाएँ । यही बात बहुत पहले रहीम जी ने भी कही कि ——

रहिमन धागा प्रेम का , मत तोरो  चटकाय ।

टूटे पे फिर ना जुरे , जुरे गाँठ  परी जाए ।।

परस्पर व्यवहार में किसी को सुधारने की आवश्यकता नहीं है ,जो भी बदलाव या जैसा तुम दूसरों से चाहते हो वह स्वयं से ही शुरू कर दो काम आसान हो जाएगा । ।। इति ।।

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