मोह और प्रेम

मनुष्य अपना सम्पूर्ण जीवन इन्हीं  द्व्ंद्वों के जाल के जंजाल में फँसा – उलझा  हुआ काट देता है । परन्तु क्या मोह और प्रेम एक ही भाव है अथवा इनमें  कोई भेद या अंतर है । ऊपरी तौर पर लगता है कि यह तो लगाव या आसक्ति है जिसे दो शब्द दे दिए गये हैं । नहीं यह ऐसा नहीं है  , यदि कुछ समझने का  प्रयास किया जाए तो एक शब्द किसी के लिए अथवा हम कहें  कि अच्छे अर्थ में है और दूसरा अर्थ जिसका दूरगामी परिणाम भयावह भी हो सकता है । 

यदि समझने की कोशिश करें तो जहाँ मोह में स्वार्थपरता है वहाँ प्रेम में त्याग की भावना है । अगर प्रेम में त्याग नहीं है तो वह  प्रेम भी नहीं है । जिस प्रकार हम प्रेम से ओत – प्रोत होते हैं तो देने का भाव , बाँटने का भाव उभरता है । प्रेम रसमय है और इसको जितना वितरित करते चलो यह उतना ही आनंद प्रदान करता है । प्रेम को आधार बना कर ही पूरे विश्व को परिवार बनाया जा सकता है । क्योंकि प्रेम असीम है और इसका दायरा सीमारहित है । प्रेम से आप किसी को भी अपना सखा – सगा बना सकते हैं ।

परन्तु मोह सर्वथा इसके विपरीत है , उसमें उदारता नहीं सीमितता है , उसका  दायरा संकुचित है इतना संकुचित कि स्वयं के साथ-साथ दूसरे को भी घुटन से भर दे ।

“अतः बाँटना प्रेम -प्रसाद है बटोरना  दुःख – विषाद है ”

यदि  विचार करें तो बहुधा परिवारों में होने वाले दुराव – अलगाव में यह मोह भी अपनी कटु भूमिका निभाता है । सामाजिक रीति परम्परा के अनुसार माता- पिता अपने बेटा – बेटी का विवाह तो कर देते हैं । परंतु मोहवश उन्हें उनके प्रेम से फलता  फूलता नहीं देख पाते । ऐसा समझते हैं कि जैसे हमारी कोई वस्तु थी जो हमसे छिन गयी ,जबकि ऐसा सोचना सर्वथा व्यर्थ है । यदि  आप उनसे प्रेम करते हैं तो आपको उनकी ख़ुशी में और भी अधिक ख़ुशी मिलनी चाहिए । पर नहीं ,ऐसा प्रायः कर  नहीं पाते या ऐसा होता सह नहीं पाते । परिवारों में होने वाली दुर्घटनाओं को यदि खंगाला जाए तो यह मोह ही है जो इतना वीभत्स रूप ले लेता है ।

कहने का अभिप्राय यह है कि हमें मोह का दामन छोड़ प्रेम को अपनाना चाहिए । यही जीने का ,आनंद का और सुख का आधार है क्योंकि —–

पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ ,पंडित भया न कोय ।

ढाई आखर प्रेम का , पढ़े सो पंडित  होय ।। इति ।।

 

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