माता पिता और बच्चे

प्रत्येक माँ बाप से यदि पूछा जाए कि संसार में आपको सबसे प्रिय कौन है ?तो निस्सन्देह सब का उत्तर होगा कि अपनी संतान ।वे सारा जीवन एकमात्र अपनी ज़िंदगी उनके इर्द -गिर्द सोचते हुए ही बिता देते हैं ,चाहे वे उनके पास हों या दूर हमेशा उन्ही की चिंता में हरपल डूबे रहते हैं ।

परन्तु अनुभवी लोगों के जीवन का अनुभव यही कहता है कि वे बच्चे जो अपने माता पिता की आज्ञा -सलाह को सुनते और मानते भी हैं वे ख़ुशहाल रहते हैं ,क्योंकि वे अपने सिर पर बड़ों का आशीर्वाद मान कर चलते हैं ।बड़ों के आशीर्वाद से बढ़ कर इस दुनिया में कुछ भी नहीं ।जो बच्चे ह्रदय से अपने माता पिता को सम्मान देते हैं ,ईश्वर उनकी मनोकामनाएँ भी शीघ्र पूरी कर देता है ।और वे निरंतर अपनी सफलताओं को पाते जाते हैं क्योंकि परमात्मा ने बच्चों को संसार में उतारने के लिए  एक निश्चित माता -पिता को माध्यम बनाया है वे अपने आप नहीं आए हैं।

परन्तु आधुनिक काल में पीढ़ी का अन्तर है अपने समय में यदि हम सोचें तो हमारे माता पिता जो कह देते थे हम केवल उसे सुनते ही नहीं अपितु उस पर अमल भी करते थे ।पर आजकल तो उन बच्चों के पास में समय ही नहीं है ,इलेक्ट्रॉनिक की इतनी चीज़ें हैं कि उनका दिमाग़ उनमें ही व्यस्त रहता है डूबा -घिरा रहता है कि माता -पिता की बात किस समय सुनें ?चाहे कुछ भी हो जाए दुनिया में सबसे अधिक प्यार संतान को माता-पिता ही करते हैं ,और वे कभी उनका बुरा करने की तो छोड़िए उनका बुरा सोच भी नहीं सकते ।सो हमारा मशविरा तो होगा कि उनकी बात ज़रूर सुननी चाहिए जो तुमसे इतना प्यार करते हैं ।

यदि आज के बच्चे अपने माता पिता की बात सुनना चालू कर दें तो उनका जो आधुनिक युग की देन है तनाव वह सारा ख़त्म हो जाएगा ,अंदर से ही स्ट्रेस ख़त्म हो जाएगा । उनकी इस न सुनने की आदत से ही एक नकारात्मक सोच उनके दिमाग़ में भर जाती है ,अगर सकारात्मक सोच रख कर सुनें ,सोचें ,आशीर्वाद लें जिसमें कि असीम शक्ति है तो ख़ुशहाल जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

आज के माता पिता के मन में बहुत सी बातें उभर कर आती हैं,उनको घुटन भी होती है पर फिर यही सोच उभरती है कि शायद जब बच्चे  स्वयं माता पिता बनेंगे तभी वे उस दर्द को समझ पाएँगे जो एक माता पिता अपनी संतान के लिए महसूस करते हैं ।शायद उस समय उनका दर्द सुनने के लिए वे माता पिता नहीं होंगे ।

अंत में ख़ैर, यह तो संसार है ऐसे ही चलता है । बच्चे स्वयं को सर्वेसर्वा मान कर चलते हैं ।अधिक नहीं , स्वयं को कर्त्ता मानना और यह सोचना कि माता पिता ने किया ही क्या है ?इसी को उलटा सोच लें कि कर्त्ता माता पिता हैं हम तो बस उनके दिशा-निर्देश से काम चला रहें हैं उनका तनाव ग़ायब हो जाएगा ।उदाहरण के लिए जैसे फ़ैक्टरी में लगी आग की तपिश जितनी मालिक तक पहुँचती है उतनी श्रमिक तक नहीं बस यही थोड़ी सी सोच बदलनी होगी फिर आनंद ही आनंद है ।

।।इति ।।

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