मक़सद या लक्ष्य

सामान्य रूप से जीवन का सपना बुनने वाले और उस दृश्य की कल्पना करने वाले लोगों की ज़िंदगी मिलती जुलती होती है ।और बहुधा साधारण सोच से ही इंसान प्रारम्भ करता है परंतु वह कब विशेष हो जाए अचानक इसका एहसास परिणाम के बाद लगता है ,और इंसान यह सोचने पर विवश हो जाता है ऐसा कैसे हो गया न कि यह कि ऐसा क्यों हो गया ?

यदि देखा और सोचा जाय तो  निचोड़ रूप में जो समझ आता है कि इंसान जैसा और जितना सोचता है वैसा कभी कुछ होता है और  कभी नहीं भी होता । जीवन में आने वाली परिस्थितियाँ  कह  लीजिये या रूकावटें  । मेरी दृष्टि में शायद ये ही बाधाएँ बन कर मनुष्य के सामने आ खड़ी होती हैं और एक चुनौती देती हैं किअब चुन क्या करना है ?  बस यहीं परीक्षा होती है । अक्सर उन परिस्थितियों को देख कर लिए गए निर्णय बाद में हमें ग़लत भी लग सकते हैं कि ऐसा न करके ऐसा किया होता तो शायद  सही रहता  ।यह हमारी सोच पर है । वैसे जो अतीत हो चुका उस में से यदि  ग्राह्य है ,तो उसे लिया भी जा सकता है परंतु केवल  पछताने के लिए अतीत के दामन का छोर पकड़ना मूर्खता है ।क्योंकि उसे तो अब पलटा नहीं जा सकता परंतु सबक़ लिया जा सकता है ,कि यदि पुनः वह परिस्थिति आ गयी तो हमारे निर्णय क्या होंगे ? बेशक ऐसी पुनरावृति की  संभावना शून्य के  बराबर होती है ।

निर्धारित लक्ष्य या मक़सद को पाने के लिए दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है ।यदि संकल्प मज़बूत है डटे रहने की ताक़त है तो कोई भी अपना मक़सद निर्बाध गति से पा सकता है ,क्योंकि किसी भी लक्ष्य की पूर्ति के लिए हमें चुनौतियों से दो चार होना पड़ता है कहा भी जाता है ——-

लहरों से डर कर नौका कभी पार नहीं होती ,

कोशिश करने  वालों की कभी हार नहीं होती ।

एक टहनी एक  दिन पतवार बनती है ,

एक चिंगारी दहक अंगार बनती है ।

जो सदा रौंदी गयी बेबस समझ कर ,

एक दिन मिट्टी वही मीनार बनती है ।।

याद रखो किसी भी कार्य की सफलता की  सीढ़ी पर चढ़ने के लिए चाहिए लगन मेहनत और  धैर्य बाक़ी सब सहारे ख़ुद ब ख़ुद चले आएँगे ।

इति 

 

 

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