ब्रह्म -भ्रम -सत्य ?

  ब्रह्म  सत्यम  जगत  मिथ्या ” विद्यार्थी जीवन काल में अध्ययन के दौरान पढ़ा गया यह वाक्य यूँ ही लगा था,तनिक भी अर्थपूर्ण या सार्थक नहीं लगा ।कितनी झूठी और ग़लत एवं विरोधी परिकल्पना – जान बूझ कर आँख मूँदना कि जो देख रहे हो प्रत्यक्ष -खुली आँखों से ,वह तो मिथ्या और जिसका अता -पता नहीं ,ठिकाना नहीं ,और कोरी कल्पना है कि जिसे कभी देखा भी नहीं वह सत्य है । यह बात हो ही नहीं सकती । प्रत्यक्ष को मिथ्या और अप्रत्यक्ष को सत्य मानना यह कहाँ की समझदारी है । ख़ैर ! अगर विचार करें तो ब्रह्म है और केवल वही सत्य है कभी इस पर उस समय गहन गम्भीर विचार नहीं किया ।

और जीवन राह में चलते चलते एक बार बी,ऐड करने के दौरान हमारे प्रोफ़ेसर ने अपने जीवनानुभव सुनाए और बताने -समझाने का प्रयास किया कि उसब्रह्म की सत्यता को मैं मानता हूँ ।और अपने साथ घटित घटना से पूर्व मैं किसी प्रकार की शक्ति या सत्ता में विश्वास नहीं करता था । उनके द्वारा सुनायी गयी घटनानुसार ,वे  एक बार पैर फिसलने से नदी में गिर पड़े ,और प्रवाह की दिशा में स्वयं को बहता देख सोचने लगे ,कि अब तो शायद जीवन का अंतिम पल आ गया , उसी समय न जाने कहाँ से एक विचार कौंधा कि अगर ईश्वर है तो मुझे बचाये -सच मानिए यह सोच आते ही उनका पाँव एक चट्टान से टकराया ,और उसका अवलंबन पा वे सुरक्षित बाहर निकल आए । उनके अनुसार उस दिन से लेकर उन्हें ईश्वरीय सत्ता में विश्वास हो गया ।और कुछ कुछ हमारे मन में भी यह विचार आने लगा कि कोई बात तो है ।

उस वृतांत के पश्चात् सोच में आए बदलाव ने विचारों को और एक नया रूप दिया।यदि अनुभूति के विषय में पूछा जाए ,तो वास्तव में इस सब के बाद मानो बुद्धि की कलुषित भावना धुल गयी ,और उसमें एक पारदर्शिता सी आ गयी। बहुत बार चिंतन मनन करते हुए लगता है कि हमारे विचारों में परिवर्तन होता रहता है ।अतीत के दृढ़ एवं स्थिर विचार अब  कहाँ हैं ? जैसे जैसे  आयु ने करवट बदली विचारों में सोच में एक नवीनता ने जन्म लिया ।और इस नवीनता ने पुराने विचारों को जीर्ण शीर्ण कर अपना अस्तित्व क़ायम कर लिया ।

अध्ययन काल और सेवाकाल ये ऐसे काल हैं जिनमे बहुत अधिक अंतर और असमानता है ।सेवाकाल के दौरान हमारी व्यावहारिक समझ बढ़ने लगती है ।देखते देखते भोगते भोगते ऐसा लगने लगता है -कि यहाँ तो भ्रम सत्य -जगत मिथ्या वाली स्थिति है ।यह ठीक कहा जाता है कि कभी भी प्रेम और सहानुभूति की परीक्षा नहीं ली जानी चाहिए ,क्योंकि इनमें सत्य का उद्घाटित होना अशांति उत्पन्न करता है ।कुछ ऐसी ही अनुभूति शायद कुछ कर पाते हों ,क्योंकि रिश्ते भ्रम में ही बने रहते हैं ।आप भ्रम में जीते रहते हैं – शांति महसूस करते हैं ,उसी भ्रम में रहते हुए प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तित्व आप के स्वयं द्वारा निर्मित होता है ।और उसी चश्मे से देखते हुए आप एक स्थिर चित्र अपने ह्रदय पर अंकित कर लेते हैं ।परंतु देर  सवेर आपका वह भ्रम टूटता है तो आपको दुःख होता है ।और कह उठते हैं कि भ्रम के रूप में जीवित सत्य ही अच्छा था ।और उस भ्रम में जीनेको आप अपने मन का सुकून समझते हैं ।परंतु नहीं ,जीवन के पाँच दशक देखने के बाद जो कुछ -कुछ समझ में आया है कि आरम्भिक वाक्य ‘ब्रह्म सत्यम वाला ‘ही सत्य है ।क्योंकि अंधेरे में लटकती रस्सी में साँप का भ्रम ,भीतर तक भय से भर देता है ।परंतु अँधेरा मिटने पर सत्य रूप में रस्सी के सामने आने पर भय जाता रहता है ।

सांसारिक रूप में भ्रम का टूट कर बिखरना और सत्य का तन कर सामने आ खड़े होना  ,बेशक आपको दुखदायी लग सकता है ।परंतु आध्यात्मिकता में भ्रम का टूटना सत्य का साक्षात्कार होना परम आनंद को प्रदान करने वाला है ।सांसारिक जीवन में जिस सत्य का सामना हम करते है ,उसे भले ही कटु कहें परंतु जो वस्तुतः सत्य है वह तो प्रिय ही है ,और मनोहारी है , प्रकाशवान है ,अज्ञानान्धकार को दूर कर उजाला दिखाने वाला है । वेदों उपनिषदों के ये वाक्य कितने गहन गम्भीर और सार्थक हैं —

“हिरण्यमयेन पात्रेन सत्यस्य अपिहितम मुखम ”

“तमसो मा ज्योतिर्गमय ” 

इति

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