परिवार

परिवार समाज की एक इकाई है और इसी का वृहद रूप समाज – राष्ट्र – विश्व का रूप ले लेता है । परिवार शब्द अपने आप में कितना सुखद एहसास समेटे हुए है । इस का अनुभव सुखी परिवार में रहने वाला ही कर सकता है । 

एक परिवार में एकजुट होकर रहना ही समझिए कितना बड़ा सुख है । परंतु इस सुख से वंचित इसकी पीड़ा को वे ही समझ सकते हैं जिन्हें परिवार नसीब नहीं हुआ ऐसा होने पर वे स्वयं को अनाथ ही समझते हैं ।

यदि आज के पर्यावरण में एकल परिवारों के बारे में सोचा जाए तो परिवार के सदस्यों की संख्या तो है परन्तु एक परिवार के प्रत्येक सदस्य का अपना ही एक अलग जीवन है । अतीत के परिवारों का दर्शन आधुनिक परिवारों में कहाँ है ? प्राचीन परम्परा  में संयुक्त परिवारों का चलन था , जहाँ सभी मिलजुल कर सहयोग समूह के रूप में रहते थे । उस समय के दुःख – सुख मिल बाँट कर भोगे जाते थे , और समय का पता ही नहीं चलता था। परन्तु अब दायरा सिमट चुका है। घर चलाने वाले दोनों सदस्य अपनी – अपनी। आजीविका पर निकल जाते हैं , और बच्चों का निर्माण या तो टी .वी करता है या आया । आया भी आयी और गयी है । मूल रूप से देखा जाए तो विज्ञान की उन्नति भी पारिवारिक बिखराव का कारण किसी न किसी  रूप में है । विज्ञान ने हमें सुख सुविधाओं  के साधन दिए हैं । जो केवल  हमारे शरीर की आवश्यकताओं को ही पूरा कर पाते हैं परन्तु वे हमारे मन तक नहीं पहुँच पाते ।

जीवन में इतनी भागमभाग है कि फ़ुर्सत ही नहीं कि मिल बैठ कर अपनी कहें और किसी की सुनें । इसके स्थान पर बेहतर मानते हैं  ऑन लाइन मेल कर देना या फ़ोन कर लेना । भला क्या इन उपकरणो – साधनों से हमारा मनोभाव दूसरों तक पहुँचता है? नहीं , इसी क्रम से धीरे – धीरे रिश्तों में भावनाशून्यता आ जाती है । भावनाशून्य होने पर मनुष्य – मनुष्य नहीं रह पाता । क्रमशः होने वाला यह अभाव हमें पशुता की ओर ले जाता है।

तो इसके लिए किया क्या जाना चाहिए ? तो थोड़ा विचार कर सोचना चाहिए कि इस मस्तिष्क की मेमरी में हमने जो बातें या आइटम भर रखें हैं , क्या वे सभी ज़रूरी हैं ? यदि नहीं तो उन्हें खंगाल कर डिलीट कर के कुछ ख़ाली स्थान बनाना चाहिए । जिससे हम किसी को अपनी कह सकें और दूसरे की सुन सकें । 

क्योंकि  तुलनात्मक रूप से ही हम किसी निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं । जैसे सबसे पहले तो परिवार में मिलने का समय निकालना चाहिए । दिन में तो सभी व्यस्त रहते  हैं । ऐसा करने का प्रयत्न करें कि रात्रि का भोजन इकट्ठा मिल कर किया जाना चाहिए । यदि सम्भव नहीं तो टाइम टेबल में ऐसा निश्चित  करें कि प्रतिदिन एक घंटा सभी मिल कर बैठें , अपनी दिनचर्या पर चर्चा करें , कोई समस्या हो तो उस पर परिचर्चा  करें । बहुत बार समाधान भी निकल आता है । अगर ऐसा कोई भी मिलने का बिंदु इसके अतिरिक्त भी हो सकता है तो सोचना चाहिए । नहीं तो फिर यही होगा सब अपनी – अपनी डफ़ली अपना – अपना  राग । परिवार के प्रत्येक सदस्य को इस बारे में सोचना चाहिए कि हम सब एक हैं और हमारी एकता में ही बल और बरकत है , विपरीत इसके जीवन ढोने के बराबर है । ज़िंदगी में मज़ा लेने वाली कोई बात नहीं । 

इन सब में एक सबसे बढ़ा फ़ैक्टर है प्रेम । अतः प्रेम से रहें , और दूसरी बात एक दूसरे के गुणों पर ध्यान दें बुराइयों को नज़रंदाज करें परन्तु समझायें अवश्य ताकि ग़लत पथ पर जाने से बच जाए । तो फिर — 

प्रेम है जहाँ ख़ुशहाली है वहाँ   ,    तो प्यार बाँटते चलो ।।इति ।।

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