पड़ाव

पावन अमृत कलश के जल बिंदु से  स्रष्टा के सृजन का अनमोल मोती सा जीवन पाकर  मानव धन्य हो गया । जीवन  के आरम्भ में शैशव में  क्रमशः लड़खड़ाने के पश्चात्  दो पगों पर स्थिर हो कर खड़ा होना सीखा तो हर्षित हुआ ,पुनः पग भर कर जब चलना सीखा तो स्वयं सा अद्भुत शायद ही कोई और होगा ऐसा समझने लगा ।बस यहीं से उसकी जीवन यात्रा को तय करने की शुरुआत हो जाती है ।और फिर  इस राह पर चलते-चलते बहुत से ऊँचे -नीचे ,ऊबड़ -खाबड़ , संकरे ,पगडंडी भरे , सुहाने , मनोहर , घुटन भरे ,ऊमस भरे ,प्रकाश एवं अंधकार से भरे न जाने कौन-कौन से और भी कई रास्तों को पार करते -करते  फिर  वह ऐसे मोड़ पर पहुँच जाता है , जहाँ के बाद राह में इतनी  विभिन्नताएँ तो नहीं रहतीं  ,परन्तु जीवन के पड़ाव या ठहराव का एक ऐसा मोड़ आता है ,जहाँ पहुँच कर उसे लगने लगता है शायद अब गतिशीलता उतनी नहीं रही ।

यह जीवन में आने वाली वह अवस्था है जिसके बाद और कोई अवस्था अवतरित नहीं  होती । सोच कर देखा जाए तो वृद्धावस्था एक ऐसी ही अवस्था है , और यह जीवन का वह  सुनहरा अध्याय है जिससे पूर्व ऐसा कोई मोड़ या पड़ाव नहीं था ।एक ठहरे हुए बहाव की नदी के समान , जिसमें ऊपर से तो  शांति दृष्टिगोचर होती है परन्तु अंतर्मन की उथल -पुथल की लहरें पहले से कहीं अधिक तीव्र हो जाती हैं ।

यहाँ पहुँच कर अतीत के दृश्यों को पलटता हुआ मनुष्य अपने सम्पूर्ण जीवन का मूल्याँकन कर सकता है । पुनर्विचार करता हुआ कोमल भाव लताओं के  गुंफ़न में बहुत बार ऐसा उलझता है कि उनसे बाहर निकलने का कोई कोर या सिरा उसे नहीं मिल पाता है । परन्तु उसे यही बीता  हुआ कल अपनी सम्पत्ति के समान लगता है और इसी परिधि में चक्कर लगाता  हुआ वह अपना समय व्यतीत करने लगता है । अतीत के झरोखों से छन कर आती स्मृतियाँ उसे कभी प्रसन्न और कभी ग़मगीन कर जाती हैं , फिर भी वह उन्हें ही समेटना और बाँटना चाहता है ।

मनुष्य का पूरा जीवन सदैव किसी आशा के वशीभूत हो भविष्य के लिए कुछ सपने संजोये उनके पूरा होने की बाट जोहता रहता है । फिर अब इस पड़ाव पर पहुँच कर उसे लगता है कि अब सपनें क्या देखने ? क्योंकि अतीत में देखे गए सभी सपनों का पूर्ण विवरण और उनका परिणाम उसके समक्ष खुला पड़ा होता  है । परन्तु फिर भी सपने देखने का मोह ,मृत्यु पर्यन्त छोड़ नहीं पाता या उससे छूट नहीं पाता । ख़ैर 

सारांश रूप में यह समझ लेना चाहिए कि यह एक ऐसा पड़ाव है , जहाँ पर पहुँच कर और आगे कोई अवस्था आने वाली नहीं है । अतः जो भी समय है उसको आनंद और ख़ुशी के पल मान कर  उनका  भरपूर लुत्फ़ उठाना चाहिए ।लेकिन प्रायः देखने में जो सोच ,अक्सर सुनायी देती है कि अब बस न जाने कब उसकी इस दुनिया की यह पुस्तक समाप्त होगी और पुनः नए सिरे से नए जीवन का नया अध्याय आरम्भ होगा और उसे याद आने लगती हैं रहीम जी की कभी पढ़ी हुई ये पंक्तियाँ ———

“माली आवत देखि के,कलियन करे पुकारि ।

फूले-फूले चुनि लिये ,कालि हमारी बारि ।।”

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