धोखा

‘जो न दे दग़ा ,वो ही है सगा ”

इस संसार में ज़िंदगी का सफ़र तय करते हुए बहुत से दृश्य आते हैं। कुछ सुहाने ,लुभावने और कुछ ऐसे भी नज़ारों से दो चार होना पड़ता है ,जिनकी पुनरावृति हम कतई नहीं चाहते ।

इस सफ़र में हमें बहुत से यात्री मिलते हैं कुछ रिश्तों के सम्बंधी होते हैं और कुछ ऐसे बिना किसी रिश्ते के होते हैं परंतु जो रिश्तों से भी बढ़कर कुछ बन जाते हैं ।कई  बार ऐसी कड़वी घूँट को भी पीना पड़ता है जिसके बारे में हमने कभी सोचा नहीं होता है ।चलते -चलते हम किसी के प्रति अगाध विश्वास करने लगते हैं परंतु हमें कई बार उसी से धोखा मिलता है ।ऐसा हम समझते हैं ,पर नहीं यह धोखा वह इंसान हमें नहीं देता क्योंकि कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे को धोखा नहीं दे सकता ,कहने का अभिप्राय यह है कि अपने से स्वयं से बढ़कर कोई किसी को धोखा नहीं दे सकता हम जब भी किसी को धोखा देने की सोचें तो समझ जाना चाहिए कि हम स्वयं को ही धोखा दे रहे हैं ।स्पष्टता के लिए इस प्रकार समझ सकते हैं ,जैसे हम किसी को कोई बात बता रहे हैं सामने वाला व्यक्ति तो उसे ही अक्षरश : सत्य समझता है ,क्योंकि उसे इस बात का इल्म भी नहीं है कि इस में कुछ झूठ मिलाया गया है परन्तु उस झूठ को बताने वाला जानता है कि इसमें कितना सच और कितना झूठ है ?अतः तो कौन किसको धोखा दे रहा है ,जो कि देर सवेर कभी न कभी उस के सामने आएगा उस समय उसे बर्दाश्त करना बहुत कठिन हो जाएगा ।

सारांश रूप में यही समझना चाहिए कि स्वयं को धोखा न दें क्योंकि हम किसी को धोखा नहीं दे सकते अतः स्वयं को धोखा देने से बचें ।सगा कोई और नहीं हम ही अपने सगे हैं ।

कहा गया है मन -वचन -कर्म से एक होता है सज्जन ,और मन-वचन-कर्म से भिन्न होता है दुर्जंन ।अतः स्वयं का हित चाहने वाले धोखे का दामन छोड़ ईमानदारी का मार्ग थामें इसी में कल्याण होगा ।

।।इति ।।

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