तलाश

मानव ने जन्म लिया, संसार में आगमन हुआ , होश सम्भाला तो ज्ञात हुआ यह जीवन है । इस को जीने के लिए , बेहतर ढंग से जीने के लिए , जिया जाए  कैसे ?इसी प्रयास में , उधेड़ – बुन की सोच में , वक़्त बीतने लगता है । हालात  के वशीभूत हुआ इंसान  उन्हीं  रास्तों में से अपने लिए जीने का रास्ता चुनने  लगता है । और रास्ता चुनने के बाद चलने पर पता  चलता है कि रास्ता तो ग़लत चुन लिया या सही चुन लिया ।

पथ या राह चुनने  की प्रक्रिया में जो उत्तम या सर्वश्रेष्ठ लगता है उसे ही चुना जाता है , बेशक उसमें बाधाएँ हीं क्यों न हों । और फिर कभी फल सोच के अनुसार होता है और कभी कुछ भी नहीं और कभी एकदम विपरीत होता है ।

जीवन की व्यस्तता और आपाधापी में बहुत कुछ अनदेखा कर दिया जाता है । बचपन  का तो कुछ पता ही नहीं चलता , वह कैसे बीत जाता है । और पूरा जीवन उन स्मृतियों को हमारा मन अपने भीतर संजोये रहता है । फिर युवा होते – होते जो समझ पैदा हो जाती है , क्रियाशीलता – कार्यक्षमता बढ़ने के साथ – साथ व्यस्तता भी बढ़ने लगती है ।और यह जीवन की अवस्था कैसे बेहोशी में कार्य करते – करते बेदम होकर  अधेड़ – वृद्धावस्था के सोपान तक पहुँच जाती है । अब इस अवस्था में यह निर्भर करता है कि युवावस्था कैसे बीती है ? आराम से सिल्वर – स्पून के सहारे या संघर्ष करते – करते जिसमें समय का पता ही नहीं चला । अब ऐसी अवस्था को बिता कर अधेड़ या वृद्ध होने वाला व्यक्ति उतना उमंगित और सक्रिय चाह कर भी नहीं हो  पाता या रह पाता । 

क्योंकि अतीत में स्वयं  ही किया गया  स्वशक्ति का अतिक्रमण उसे भीतर से और बाहर से यानि शारीरिक एवं मानसिक रूप से तोड़ चुका होता है । उसे पुनः स्पंदित करने के लिए एक सहारे की तलाश होती है , जो भावनाओं को सहला सके , उसे शक्ति दे  सके । यदि उसे यह सहारा मिल जाता है तो भावनात्मक रूप से मज़बूत होने के बाद , उसकी शारीरिक शक्तियाँ संचित हो कर  पुनः संचारित होने लगती हैं। और वह फिर से जीवन  की मेराथन दौड़ में जीत हासिल करने का  सपना देखने लगता है । परन्तु इसके विपरीत यदि उन चरमराते हुए भावों को सहारा न मिले तो उसका खड़ा होना भी मुश्किल हो जाता है । मगर उस समय सर्वाधिक सहायक जो कोई भी बने , वही उसका सर्वप्रिय बन जाता है ।

इस  समय उसकी सबसे बड़ी तलाश – आस में उसे अपनों में अपनी संतान की होती है , वह उसी की बाट जोहता है । क्योंकि पल – पल आज तक उनके अरमानों को बुनते- बुनते बढ़ा – बूढ़ा हुआ है । यदि उनकी ओर से उपेक्षा हो तो यह बात उसे पूरी तरह से धराशायी कर देती है ।

परन्तु ये तो जीवन की अवस्थाएँ हैं , सभी के जीवन में आती हैं । वक़्त बढ़ता रहता है , चलता रहता है । कुछ समय से पहले संभल कर वक़्त के तक़ाज़े और अन्दाज़ को समझ कर संभल जाते हैं । और कुछ हालात में पड़ कर पछताते हैं ।

कहीं ऐसा न हो कि मनचाही तलाश , कहीं आस की टकटकी लगाई हुई आँखों को नज़रंदाज कर दे  । इसलिए बेहतर है कि अपेक्षाओं को भूल कर या उनकी उपेक्षा कर चैन की बाँसुरी बजा कर , मंत्र मुग्ध हो कर , आनंदित रहें । ।इति ।।

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