तत्त्व -तथ्य

जीवन और मृत्यु जीवन के ऐसे दो ध्रुव अटल सत्य हैं ,जिनसे मुँह मोड़ना, नकारना , अस्वीकारना संभव नहीं ।ये ऐसे सार्वभौमिक , सार्वकालिक  सत्य -तथ्य हैं  जिसे  सभी जानते हैं परन्तु  विडम्बना यह है कि फिर भी हम अनजान नहीं अनचाहवान ज़रूर हैं । इन दोनों में से मानव केवल एक छोर  को पकड़े ही रहना चाहता है , दूसरे छोर की ओर ध्यान ही नहीं करता है ।

अरे ! ये बीतते पल, बढ़ते पग , तीव्रता से किस ओर जा रहे हैं ,उसी ओर उस छोर की ओर । और यदि हम  यह मान लें कि जीवन ही मृत्यु है और मृत्यु ही जीवन है तो जगत में कुछ भी अप्रत्याशित नहीं होगा । जो होगा वह यही  कि यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है और परिवर्तन क्रियाशील होते हुए भी स्थिर है । मृत्यु स्थल की ओर प्रतिपल बढ़ते हुए जीवन जी रहे हैं । नहीं ,इसे ऐसा सोचें कि हम पुनर्जन्म की ओर बढ़ रहे हैं , एक नवीन जीवन की ओर क्योंकि आत्मा को अमर कहा गया है तो फिर इसे समझने का प्रयास करते हैं  जैसे कि आत्मा – परमात्मा ये दो तत्त्व हैं , परन्तु आख़िर ये हैं  क्या ?जिन्हें समझ पाना सामान्य मानव जीवन में संभव नहीं ।

गीता ने कहा – आत्मा अमर है , यह बात एक साधारण व्यक्ति की समझ से बाहर है । यदि कोई  रूग्ण  है और उसे पूछें कि क्या हुआ ? तो वह कहता है ‘ मैं बीमार हूँ ‘ अर्थात् सोचा जाए तो यहाँ भी उसका मैं नहीं अपितु शरीर रोगी है । कोई गिरा तो बोला ‘ मैं गिर गया ‘ यहाँ भी शरीर गिरा , आहत  हुआ और चोट लगी ।

इतने पर भी लोग समझ नहीं पाते , किसी की मृत्यु पर होने वाला शोक अर्जुन की सोच का ही शोक  होता है । जब शरीर की सीमा रेखा पार कर उस  तथ्य को तत्त्व को समझ पायें तो यह शोक -मोह नहीं होगा ।

एक उदाहरण यदि  स्पष्ट करने के लिए लें कि रामलीला देखते हुए हमने देखा कि रावण मर गया ,परन्तु वास्तव में रावण रूप में अभिनेता रामलाल तो जीवित है । और जो मरा वह रंगमंच का पात्र रूप रावण मर गया । और फिर अभिनय के बाद वह तो सुरक्षित -स्वस्थ ही रहा ,वह तो रावण का अभिनय कर रहा था । 

इसी प्रकार विभिन्न स्थानों पर  विभिन्न नाम वाले पात्रों  ने रावण का किरदार निभाया और अभिनय के बाद में आगामी वर्ष में अभिनय करने के लिए पुनः तैयार हो गये । अब इस दृष्टान्त में पात्र रूप अभिनेता को थोड़ी देर समझने के लिए मान सकते हैं  कि वह आत्मा है और उसका खोल रावण रूपी अभिनेता ही मरा । वास्तविक यथार्थ और जो सत्य रूपी पात्र है वह तो जीवित है । समझने भर के लिए आत्मा की अमरता को समझा जा सकता है मात्र उदाहरण भर  के लिए । विशेष तत्त्व के लिए तो गहन  चिन्तन की आवश्यकता है । इस संसार रूपी रंगमंच पर अपना-अपना किरदार निभाने के लिए हम यहाँ क्रियाशील हैं। यही रामलाल एक ही अभिनेता कई पात्रों का अभिनय करता है कभी रावण , मेघनाथ —–आदि । पर वह एक है आत्मा की तरह । और इस प्रकार एक ही आत्मा अपना शरीर रूपी खोल छोड़ कर दूसरे खोल में नए अभिनेता के रूप में नवीन अभिनय के लिए चली जाती है 

एक उदाहरण वर्तमान में साधारण रूप से प्रयोग होने वाली घटना से भी स्पष्ट करने के लिए लिया जा सकता है जैसे कि सभी प्रायः जानते हैं  कि आपरेशन थिएटर में जब मरीज़ को बुलाया जाता है तो नाम लेकर कहा जाता है कि मरीज़ श्यामलाल को ले आओ , और यदि दुर्घटनावश आपरेशन थिएटर में उसकी मृत्यु हो जाती है तो कहते हैं  बॉडी ले जाओ । जो कि नाशवान है ,जब तक आत्मा भीतर था तो उसका नाम श्यामलाल था अब वह इसको छोड़ कर दूसरे स्थान पर प्रवेश कर गया और उसका नाम भी कोई दूसरा हो गया , अभिनेता पात्र के समान ही उसका किरदार बदल गया । बस इसी तरह से अमर आत्मा अपना शरीर , घर कुछ भी कह लीजिए बदलता रहता है और वह स्वयं निर्लिप्त ही रहता है ।

आत्मा की इसी यात्रा को गीता में इस प्रकार से कहा गया है ——–

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्नाति  नर : अपराणि ।

तथा  शरीराणि विहाय जीर्णानि  अन्यानि संयाति नवानि देही ।।

अर्थात् जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर दूसरे नए  वस्त्रों को ग्रहण करता है ,वैसे ही जीवात्मा पुराने  शरीरों को त्याग कर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त करता है ।।इति ।।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *