जीवन -मृत्यु

प्राचीन काल से लेकर आज तक मनुष्य इसी प्रश्न की तलाश में है कि जीवन क्या है ? और मृत्यु क्या है ? ऋषि मुनि अपनी -अपनी समझ और विचारधारा के अनुसार , अनुभव के आधार पर विभिन्न मत रखते हुए इस संसार को छोड़ कर चले गये ।

सृष्टि के नियम में ये दोनों बातें जीवन और मृत्यु अटल हैं ,इसे कोई भी मिटा नहीं सकता ।गीता में कहा गया है ——-

“जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं  जन्म मृतस्य च ।” क्योंकि इस मान्यता के अनुसार जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है ।

जन्म लेने के साथ ही मानव जीवन की मृत्यु की ओर जाने वाली कड़ी आरम्भ हो जाती है या यूँ कहें कि उलटी गिनती शुरू हो जाती है । संसार में जन्म लिया और मनुष्य की यात्रा प्रारम्भ ,कौन सी यात्रा है ?यह यात्रा ही मृत्यु की ओर जाने की है अर्थात् जब तक मृत्यु नहीं आती तब तक उस यात्रा को पूरा करना है । और प्रश्न है कि इस यात्रा को मंज़िल तक कैसे पहुँचाया जाए ?

सारी जद्दोजहद इसी जीवन को जीने में है कि जीने की कौन सी राह चुनी जाए ? किस पर चल कर सुकून से जीना संभव है ? इसका निर्णय मनुष्य जीवन में आने वाली परिस्थितियों को देख कर परख  कर करता है और अपनीं राह चुनता है ,और उस राह में सुख -दुःख सभी आते हैं उन्हें किस तरह से अपने योग्य -अनुरूप बनाए ताकि जीवन की राह आसान हो सके ,उसके सारे प्रयास इसी सोच पर केंद्रित रहते हैं कि कठिनाईयों को कैसे पार करें । जीवन में आने वाली छोटी-छोटी बड़ी से बड़ी बाधाओं को कैसे पार किया जाए और साथ ही छोटी -छोटी ख़ुशियों में कैसे आनंद मनाया जाए ?इन सब का आधार मानवीय सोच विचार ही है ,इसी चिंता-चिंतन -मनन में ही जीवन बीत जाता है ।

परिणामतः देखें तो सुकून भरी राह यही हो सकती है कि मनुष्य वर्तमान में जिए ,बीते का ग़म न आगे की फ़िक्र यही है ज़िंदगी इसलिए 

“बीति ताहि बिसार दे ,आगे की सुधि ले ”

अतःवर्तमान में जीते हुए अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर रहो ,किसी का भला कर सको तो करते चलो । इति ।

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