जीवन – जंग ?

प्रत्येक सांसारिक प्राणी सुखों की चाह में अपनी आहुति देकर भी जीना चाह रहा है या इसे यूँ समझें कि हम अपने भीतर किसी चाहत को पाल कर उसकी पूर्ति के लिए निरंतर संघर्षरत हैं । जीवन एक रणक्षेत्र है इसमें जूझना पड़ता है । यह बात बचपन में समझ नहीं आती , अथवा तब तक समझ नहीं आती जब तक हमें संसार के कुरुक्षेत्र की जंग में उतरना नहीं पड़ता ।

माता -पिता की सुरक्षित छांव में पलते हुए इस वाक्य का एहसास तो क्या अर्थ भी दूर-दूर तक समझ में नहीं आता । परन्तु जैसे-जैसे बालपन धुँधला होने लगता है , अपनी समझ-समझ पर हावी होने लगती है , तो कुछ -कुछ समझ आने लगता है कि ज़िंदगी जीना इतना आसान नहीं है । कुछ लोग ऐसा भी सोचने लगते हैंकि ज़िंदगी में ‘चाहत ‘का न कोई मूल्य है न कोई अर्थ ,क्योंकि तुम वैसी ही ज़िंदगी जीते हो जैसी तुम्हारे सामने आती है ,चाहो या ना चाहो ।

यदि विचार किया जाए तो ज़िंदगी के मायने सब के लिए कभी भी एक से नहीं हो सकते । जीवन के प्रति हमारा नज़रिया वही होगा जैसा हमें अनुभव होता है । एक अमीर और मज़दूर के लिए ज़िंदगी की परिभाषा एक समान कैसे हो सकती है ?

तो क्या ज़िंदगी जीने के ढंग पर निर्भर करती है ? शायद नहीं । इसमें सबसे प्रमुख है ‘मन ‘ कहा जाता है ना कि  ” मन यदि चंगा तो कठौती में गंगा ” इस आधार पर एक साधनहीन प्राणी भी सुखी जीवन जी सकता है  जबकि एक साधन सम्पन्न  भी दुखी जीवन जीता है ।

यह निर्भर करता है हमारे मन की सोच पर , जैसा कि गीता में मन को ही नियंत्रित करने की बात कही गयी है । जिसका मन विचलित नहीं है , स्थिर बुद्धि कहलाता है मन शांतचित्त होने पर सारे कुविचार शांत होकर सद्विचार उभरने लगते हैं । और यदि मन निर्विचार हो पाए तो असीम शांति का अनुभव हो सकता है ।

अब जीवन यदि जंग है तो जंग में क्या होता है ? इसमें होती है हार या जीत , तो फिर हमारी जीवन की सोच में हमें किससे जीतना है , हमें अपने मन को ही जीतना है क्योंकि —-

“मन के जीते जीत है मन के हारे हार ”

आइए ,मन को अपने वश में करें स्वयं को इसके वश में न होने दें । अपने मन के बॉस ख़ुद बनें उसे अपना सेवक बनायें जो तुम्हारे आदेश का पालन करे ,फिर जीवन  में जीत  का भरपूर आनंद उठाएँ , चहुँ ओर मंगल ही मंगल है ।। इति ।।

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