जीवन

 

दिन निकलता है 

और रात भी होती है ,

फिर 

अगले दिन के इंतज़ार में 

यूँ ही ज़िंदगी तमाम होती है ।

जीवन में भी आते हैं

इसी तरह दिन और रात ,

कभी पूर्णिमा तो कभी 

अमावस की रात होती है ।

या 

कभी चाँद रहित  तो कभी चाँद रात 

होती है ,

सोचा कभी –

जीवन एक पुस्तक है ,

जिसको पढ़ते -पढ़ते कब 

कौन सा आख़िरी पन्ना बन जाए ,

वहीं बंद कर पुस्तक 

पाठक इस जहाँ से 

विदा हो जाए ।

अगले सफ़र पर अपनी ,

अनदेखी यात्रा पर ।

सृष्टि नियम है जीवन का ,

आना जाना तो लगा ही रहता है ।

समझ कर इस बात को ,

ख़ुश हो जा बंदे तू क्यूँ   उदास रहता है ।।

इति 

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