एक सोच

मनुष्य जीवन  में आने वाली परिस्थितियों के आधीन है और उसे उनका सामना निश्चित रूप से करना पड़ता है । जबकि कुछ तो डट कर परिस्थितियों का सामना करते हैं । पर ऐसे सूरमा विरले ही होते हैं । तो फिर क्या करें ? विचारपूर्वक या तो पूरी ताक़त लगा कर परिस्थितियों को बदल दें अगर नहीं बदल सकते तो ख़ुद को बदल लें । 

मान लीजिए ऐसा होता है कि एकाएक कभी कोई क्रोध के आवेश में आपसे ऐसी विस्फोटक उक्तियाँ कह डालता है , जिन्हें सह पाना आपके लिए तो बस बिलकुल सम्भव ही नहीं , पर तनिक रुक कर सोचिए कि परिस्थितिवश क्षणिक आवेश में तुरंत हुई प्रतिक्रियास्वरूप , कहे कथन का औचित्य क्या ? उसे अन्यथा न लेना चाहिए । 

विधाता ने जितना और जैसा जीवन लिख दिया उसे वैसा ही स्वीकारने में सुख , विपरीतावस्थानुभव  में दुःख होगा । परिस्थितियों के चलते कभी मनुष्य समय-वक़्त की उस सीमा पर पहुँच जाता है  जब उसे लगता है कि उसे किसी की सहानुभूति या हमदर्दी की आवश्यकता नहीं , परन्तु समय चक्र है जो परिवर्तित होता रहता है उसे समझ लेना विवेक है और न समझना अविवेक है ।

परिश्रम और परिश्रम सतत करते रहने पर भी उद्देश्य या फलप्राप्ति न हो पाने की स्थिति में अवशिष्ट है विवशता , चूँकि  यदि ऐसा न होता तो हम निश्चय ही सदैव विजयी होते । अपने को अपने आप से सांत्वना देने हेतु विफलता को नियति मान लेना समीचीन न होगा । मानव , मन से नियंत्रित रहने पर केवल मृगतृष्णा  ही पा सकता है । यदि सम्पूर्ण शांतभाव  को पाना हो तो मस्तिष्क की सोच उपयोगी सिद्ध हो सकती है ।

कोई किसी के लिए न तो जीता है  और न मरता है , ऐसी सोच एक सत्य है । इससे विपरीत सोचना केवल भ्रम है और दिग्भ्रमित होने अथवा करने का एक छलावा है । इस जीवन के रहते ही इस भ्रम और ख़ुशफ़हमी को बाहर निकाल फेंकना चाहिए कि इस दुनिया में मेरे बाद बहुत बड़ा नुक़सान हो जाएगा । ऐसा कुछ नहीं होगा । सभी इस परिवर्तनशील  जगत में अपने – अपने हिस्से का सुख या दुःख भोगने के लिए आते हैं और परिस्थितिवश रिश्तों के मायाजाल में फँस कर मोहग्रस्त हो जाते हैं । 

हमारी अनुभूतियाँ अपनी हैं और उन्हें विभाजित नहीं किया जा सकता । कोई  सह – अनुभूति करता है यह भी एक क्षणिक सुकून है , जो स्थायी है वह केवल  वेदना  टीस और पीड़ा है । जो किसी भी मौक़े बेमौके अथवा क्षण में छाया के समान हमारा पीछा नहीं छोड़ती है । यदि उससे व्यतीत – अतीत से मुक्ति का उपाय खोजना चाहें तो सरल अर्थ में है अपने मन – मस्तिष्क को नियंत्रित रखो, और उस पर ऐसा कोई भाव हावी न होने दो । सदैव स्मरण रहे —–

“गुज़रता हुआ वर्तमान का हर पल अतीत के गर्त में गुम होता जाता है ” ।। इति ।।

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